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हिंदुस्तान देश और यहां के बासिंदों की सुरक्षा के लिए हमारी आर्मफोर्सेज हमेशा तैयार रहती हैं. देशभक्ति और वतन से प्यार करने वाले जांबाज़ जवान देशवासियों की खातिर खुद को न्योछावर कर देते हैं. और अंत में तिरंगे में निपटकर भारत माता की गोद में हमेशा-हमेशा के लिए बैठ जाते हैं.

लेकिन आज हम आपको एक ऐसे जांबाज़ सैनिक के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके आगे सरकार को भी नतमस्तक होना पड़ गया था. दरअसल, बात लगभग पांच साल पुरानी है. जिसका अंत हाईकोर्ट के एक बड़े फैसले से हुआ. जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय वायुसेना के पायलट के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए साल 2005 में मिग-21 विमान में घायल हुए पायलट को 55 लाख मुआवजा देने का आदेश जारी किया था.

हां… आपको ये जानना भी बेहद जरुरी है कि इस दुर्घटना में पायलट की जान जाते-जाते बची थी. और उस पायलट का नाम है. संजीत सिंह कैली.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र सरकार और हिंदुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड को भारतीय वायुसेना के पायलट को 55 लाख रूपये मुआवजा देने का आदेश दिया था. और ख़ास बात ये है कि आज़ाद हिंदुस्तान का ये ऐसा पहला था, जिसमें हाई कोर्ट ने किसी पायलट को इतनी राशि का मुआवजा देने का आदेश दिया हो.

तो अब इस पूरे मामले की बारीकियों को समझते चलें… ये ऐतिहासिक फैसला जस्टिस एस.रवींद्र भट्ट और जस्टिस दीपा शर्मा की बेंच ने दिया था. इस फैसले में कहा गया कि पायलट को तय मानक से अधिक जोखिम में डालने के कारण विमान बनाने वाली कंपनी और केंद्र सरकार मुआवजा भुगतान करें. और वह इसकी जिम्मेदार है.

इस फैसले के मुताबिक, केंद्र सरकार को 5 लाख और कंपनी को 50 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया.

आगे हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सशस्त्र बल को तय मानक से अधिक जोखिम में नहीं डाला जा सकता है. सशस्त्र बल को अगर तय मानक से अधिक जोखिम भरी परिस्थितियों में डाला जाता है, तो यह जीने के अधिकार का उल्लंघन है. और संविधान के मुताबिक भी, जीने के अधिकार के तहत सुरक्षित वातारण में काम करने का अधिकार हर एक नागरिक को है.

बता दें विंग कमांडर संजीत सिंह कैला ने 2013 में ये याचिका दायर की थी. जिसमें कैला के मुताबिक, 2005 में वह राजस्थान के एयर फोर्स स्टेशन में स्वाडन लीडर के तौर पर तैनात थे. 4 जनवरी को मिग-21 को लेकर उन्होंने नियमित उड़ान भरी थी. उड़ान भरने के कुछ देर बाद ही विमान के पिछले हिस्से में आग लग गई. और आग भयानक थी. लपटें तेजी से उठ रहीं थीं. ऐसे में आपात स्थिति को देखते हुए तुरंत उसे उतारने का फैसला लिया. नीचे गांव था, ऐसे में इलाके से दूर विमान को ले जाया गया और क्रेश से ठीक कुछ सेकंड पहले खुद को बचाने की कोशिश की. लेकिन इस हादसे में रीढ़ की हड्डी में चोट लगने की वजह से दोबारा विमान चलाने लायक नहीं रहा.

ख़ास बात यह भी है कि आरटीआइ से जानकारी मिली थी कि कोर्ट ऑफ एन्कवारी में ये बात सामने आई है कि एचएएल के उत्पादन में खराबी और खराब देखदेख के कारण यह दुर्घटना हुई थी. जिसके बाद जवाबदेही कम्पनी और सरकार पर गई.

इस पूरे केस में याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि मिग-21 की दुर्घटना में कथित उत्पादन खराबी और दोषपूर्ण देखरेख के लिए सरकार और एचएएल को अदालत उनसे माफी मांगने का निर्देश दें. साथ ही मिग-21 के उत्पादन की खराबी के कारण ही यह हादसा हुआ था. इस हादसे के लिए एचएएल को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

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