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यूपी यानी उत्तर प्रदेश, जहां की राजनीति सियासी खून से सनी हुई नज़र आती है. और ये बात दिन-ब-दिन होती आपराधिक घटनाएं और भी पुख्ता कर देती हैं. जोकि बड़े से बड़े सियासत के जयचंद भी स्वीकार करने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं कर रहे.

आज की कहानी सियासत के उस पगडंडी की है. जहां नेताओं का सहारा मिला और फिर लगा नेता जी के क़त्ल का इल्जाम. और ये सब उत्तर प्रदेश में हुआ.  दरअसल, कानपुर में बीते शुक्रवार को गैंगस्टर विकास दुबे ने अपने गुर्गों के साथ आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी.

vikas dube

अब इस घटना के बाद विकास दुबे की तलाश में पूरा पुलिसिया महकमा लग गया है. हर तरफ धरपकड़ तेज है. लेकिन इन सब से परे एक बात ये भी है कि इस घटना के मुख्य आरोपी विकास दुबे के राजनीतिक संबंध इतने मजबूत हैं कि उसका नाम जिले के टॉप 10 अपराधियों की सूची में शामिल ही नहीं है, जबकि उसके खिलाफ 71 आपराधिक मामले दर्ज हैं.

विकास दुबे का नाम राज्य के 30 से अधिक टॉप के अपराधियों की एसटीएफ सूची में भी शामिल नहीं है, जो इस साल की शुरुआत में जारी की गई थी. विकास दुबे और उसके कद के बारे में शुक्रवार से पहले तक राज्य के लोगों को अधिक पता ही नहीं था, भले ही उसके खिलाफ कई जघन्य आपराधिक मामले दर्ज थे. और इसकी वजह, क्योंकि वह चुपचाप काम करता था और यही कारण है कि राज्य के खूंखार माफियाओं की सूची में उसका नाम तक शामिल नहीं.

एक बड़े इलाके में अपनी हनक के कारण वह नेताओं की ज़रूरत बन गया था. लोगों के अनुसार, वह विधायक और फिर एक सांसद बनना चाहता था. वह अक्सर कहता था कि वह जल्द ही संसद पहुंचेगा. उसकी स्थानीय राजनेताओं के साथ अच्छी सांठगांठ थी और इसका कारण यह था कि पुलिस ने उसकी गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं किया.

थाने के अन्दर की थी हत्या

विकास दुबे पहली बार 2001 में सुर्खियों में आया, जब उसने कानपुर के शिवली पुलिस स्टेशन के अंदर भाजपा नेता संतोष शुक्ला की हत्या कर दी. जब शुक्ला की मौत हुई, तब वह यूपी सरकार में दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री थे. हालांकि, दुबे को बाद में एक सत्र अदालत ने उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत न होने के कारण बरी कर दिया. एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां तक कि पुलिसकर्मियों ने भी अदालत में उसके खिलाफ गवाही देने से इनकार कर दिया था. अब इस बात से आप उसके खौफ का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

यही नहीं, विकास दुबे पर 2018 में माटी जेल के अंदर रहने के दौरान अपने चचेरे भाई अनुराग की हत्या की साजिश रचने का भी आरोप है. विकास दुबे अनुराग की पत्नी के नामित चार अभियुक्तों में से एक था. उसने अपराध की दुनिया में कई बड़े कारनामों को अंजाम दिया, जो उसे राजनीति के करीब ले गए.

कानपुर के बिकरू गांव के रहने वाले विकास दुबे ने नौजवानों के साथ मिलकर अपना एक गिरोह बनाया था. जैसे-जैसे उसके खिलाफ डकैती, अपहरण और हत्याओं के मामले बढ़ने लगे, विकास ने सुनिश्चित किया कि उसका दबदबा भी इसी तरह से इलाके में बढ़ता चला जाए.

धीरे-धीरे चुनाव में उसकी मदद स्थानीय राजनेताओं की जरूरत बन गई, जिससे वह सत्ता के भी करीब आ गया. स्थानीय सांसदों और विधायकों ने अपना हाथ विकास के सिर पर रख दिया, क्योंकि सभी जानते थे कि उसके प्रभाव से उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिलेगी. उसके राजनीतिक गुरुओं ने उसकी अन्य राजनेताओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित कराई. यहां तक कि उसने 2015 में नगर पंचायत चुनाव जीतने में भी कामयाबी हासिल की. जब उसके गुरुओं ने अपनी पार्टी बदली तो विकास भी उसी दिशा में घूम गया. यहां तक कि जब विधानसभा सत्र होता तो विकास दुबे को अक्सर विधान भवन परिसर में देखा जाता था. ऐसा एकबार नहीं अनेकों बार होता रहता था.

विकास दुबे ने शुरुआत बहुजन समाज पार्टी से की. लेकिन उसके बाद समाजवादी पार्टी की सरकार आई तो सपाई बन गया. और अब जब सूबे में भाजपा की सरकार है तो उसे भारतीय जनता पार्टी के करीब देखा गया.

सोशल मीडिया पर एक पोस्टर वायरल हो रहा है, जिसमें एक तस्वीर में विकास अपनी पत्नी ऋचा दुबे के लिए समाजवादी पार्टी के बैनर तले प्रचार करता नजर आ रहा है. उत्तर प्रदेश के कानून मंत्री बृजेश पाठक के साथ उसकी तस्वीर राजनेताओं के साथ उनकी निकटता को दर्शा रही है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुफिया एजेंसियों को निर्देश दिया है कि वे उन सभी राजनेताओं, पुलिस कर्मियों, अधिकारियों और अन्य लोगों की एक लिस्ट बनाएं, जो विकास दुबे को संरक्षण दे रहे थे.

इस बीच राजनीतिक नेताओं के साथ गैंगस्टर की तस्वीरें लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. पिछले वर्षों में दुबे ने धीरे-धीरे कानपुर के बिल्हौर, शिवराजपुर, चौबेपुर, रनिया इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की है.

vikas dube

सूत्र ने कहा कि विकास ने इस क्षेत्र में बहुत अधिक संपत्ति बनाई है और कथित तौर पर लखनऊ और नोएडा में भी उसकी प्रॉपर्टी है. ऐसे में अब विकास दुबे पुलिस की गिरफ्त से कब तक दूर रहता है. ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तो साफ़ है कि रसूखदार नेताओं की छाया ने ही विकास दुबे को फलने-फूलने का मौका दिया.

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