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आमतौर पर भारतीय राजनीति में ऐसे कई घटनाक्रम हुए हैं. जिन्होंने हिंदुस्तान ही नहीं समूची दुनिया को सोच में डाल दिया. वैसे भी भारतीय राजनीति पर एकतरफा पकड़ बताने वाले बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित भी कई बार मुँह की खा चुके हैं. कमोवेश हर बार कुछ ऐसा ही हो जाता है. लेकिन आज हम उन तीन बड़े राजनीतिक खुलासों की बात करने जा रहे हैं. जिनके उजागर होने से बड़े-बड़े नेताओं की पतलून खिसक गई.

पहला…

1- जब सोनिया ने तय कर लिया था कि मनमोहन होंगे प्रधानमंत्री

1999 में जब अटल सरकार एक वोट से विश्वासमत हार गई, तो गेंद विपक्ष के पाले में आई. सोनिया गांधी ने सरकार बनाने की कोशिशें तेज कर दीं. आखिर में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने इस पर वीटो कर दिया और देश में मध्यावधि चुनाव हुए. मगर दिलचस्प यह है कि अब तक ज्यादातर लोग यह मानते थे कि उस वक्त सोनिया को प्रधानमंत्री बनने की हड़बड़ी थी.

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कहा जाता है कि सोनिया ने राष्ट्रपति केआर नारायणन को समर्थन पत्र की सूची और सरकार बनाने का दावा, दोनों सौंप दिए थे. मगर राष्ट्रपति नारायणन की माने तो सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थीं.

उन्होंने नारायणन से कहा था कि अगर गठबंधन बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा जुटा लेता है, तो वह मनमोहन सिंह को शपथ दिलवा दें. यानी सोनिया 2004 में नहीं, बल्कि उससे पांच साल पहले ही मनमोहन को गद्दी पर बैठाने का फैसला कर चुकी थीं.

शायद इसी रणनीति के तहत 1999 में मनमोहन सिंह को पहली और आखिरी बार लोकसभा चुनाव लड़वाया गया. मगर, साउथ दिल्ली सीट पर वह बीजेपी के विजय कुमार मल्होत्रा से 30 हजार वोटों से चुनाव हार गए.

2- मायावती ने छुए अटल के पैर और फिर मिला… धोखा

अप्रैल 1999, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को सत्ता में 13 महीने बीत चुके थे. तभी गठबंधन की अहम सहयोगी जयललिता की एआईएडीएमके ने समर्थन वापस ले लिया. सरकार अल्पमत में आ गई. उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री रह चुकी बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अटल के राजनीतिक प्रबंधकों को भरोसा दिलाया कि वह एनडीए का समर्थन करेंगी. उस वक्त एक-एक वोट की कीमत थी. विश्वास मत पर वोटिंग वाले दिन मायावती अटल से मिलने गईं, उनके पैर छुए और पार्टी के छह सांसदों के समर्थन की बात कही.

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मगर फिर लोकसभा में मायावती पलट गईं. बीएसपी सांसदों ने एनडीए सरकार के खिलाफ वोट दिया. सरकार एक वोट से गिर गई. मायावती ने खुशी जाहिर करते हुए प्रेस से कहा, मैंने जान बूझकर बीजेपी को मूर्ख बना दिया.

3- रो पड़े राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा

6 दिसंबर 1992, दोपहर 12.30 बजे देश भर को पता चल गया कि उन्मादी कारसेवक अयोध्या में बाबरी मस्जिद के एक गुंबद पर चढ़कर उसे तोड़ने में जुट गए हैं. दिल्ली स्थित तमाम मुस्लिम नेता प्रधानमंत्री दफ्तर में फोन करने लगे. हस्तक्षेप की उम्मीद के साथ. मगर हर बार जवाब मिलता, प्रधानमंत्री आराम कर रहे हैं. दोपहर 2.30 बजे कई नेता, समाजसेवी और धर्मगुरु राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से मिलने पहुंचे.

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शर्मा रो रहे थे. उन्होंने आए हुए लोगों को एक खत दिखाया. ये खत शर्मा ने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को लिखा था. इसमें कहा गया था कि अयोध्या में स्थिति विस्फोटक है, राज्य की बीजेपी सरकार की स्थिति साफ नहीं है. ऐसे में राज्य सरकार बर्खास्त कर केंद्र को सुरक्षा व्यवस्था अपने हाथ में ले लेनी चाहिए. फिर शर्मा बोले, मगर मैं भी प्रधानमंत्री तक नहीं पहुंच पाया.

यहां यह भी याद करना जरूरी है कि शंकरदयाल शर्मा के इनकार के बाद ही नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली थी. दरअसल तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में राजीव गांधी की लिट्टे के आत्मघाती हमलावर दस्ते के हाथों हत्या के बाद पार्टी में हर कोई उनकी विधवा सोनिया गांधी से नेतृत्व की उम्मीद कर रहा था. सभी ने उनसे कांग्रेस अध्यक्ष बनने को कहा. उस वक्त यह साफ था कि जो पार्टी संभालेगा, वही सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री बनेगा.

सोनिया ने इससे साफ इनकार कर दिया. मगर नया अध्यक्ष उन्हीं की सहमति से बनता, यह साफ था. सोनिया ने परिवार के पुराने साथी और नौकरशाह रहे पीएन हकसर से मशविरा किया. हकसर ने उपराष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा का नाम सुझाया. शर्मा ने अपने खराब स्वास्थ का हवाला देते हुए इनकार कर दिया. तब बारी आई नरसिम्हा राव की.

उस वक्त तक राव राजनीति से संन्यास लेने का मन बना चुके थे. राजीव गांधी की गुड बुक में वह थे नहीं. हालत ये हो गए थे कि उनकी राज्यसभा सांसदी भी खत्म हो गई थी. जब वह हैदराबाद जाने को तैयार थे, तभी सोनिया ने ऐलान किया. ऑलराइट, इट्स पीवी देन. और नरसिम्हा राव को पहले पार्टी और फिर चुनाव नतीजे आने के बाद देश की कमान मिल गई.

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