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साल 1985 के दौरान लखनऊ के आस-पास के इलाकों में बाढ़ आई थी. प्राइम मिनिस्टर राजीव गांधी यहां दौरे पर आए थे. लौटते समय अमौसी हवाई अड्डे पर राजीव गांधी ने गोरखपुर के एक कांग्रेसी नेता के साथ लम्बी मीटिंग की. अगले दिन अखबार इस बात से भरे पड़े थे कि इस शख्स को चीफ मिनिस्टर बनाया जा सकता है. कयास सही साबित हुए.

तत्कालीन चीफ मिनिस्टर एनडी तिवारी ने इस्तीफ़ा दे दिया और इस गोरखपुरिया को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया. इस शख्स का नाम था वीर बहादुर सिंह. कहा जाता था कि वो राजीव गांधी के “कॉन्ट्रैक्ट चीफ मिनिस्टर” थे, जिन्हें कुछ ”ख़ास कामों” के लिए नियुक्त किया गया था.

पूर्वांचल की राजनीति में यूं उभरे वीर बहादुर सिंह.

रोचक

गोरखपुर की राजनीति अभी गोरखनाथ धाम से तय होती है. लेकिन एक दौर में यहां बाबा राघवदास देवरिया की मजबूत छवि थी. बाबा राघवदास को पूर्वांचल का गांधी कहा जाता था. इसके बाद प्रोफ़ेसर शिब्बन लाल सक्सेना और समाजवादी उग्रसेन का उभार हुआ.

गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पंडित सूरतनारायण मणि त्रिपाठी और महंत दिग्विजय नाथ की राजनीतिक लड़ाई चर्चा में रही. यादवेन्द्र सिंह ने रामायण राय को हराया था और मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह को राम कृष्ण द्विवेदी हराकर गोरखपुर की राजनीति में चमक चुके थे.

तब तक वीर बहादुर बहुत बड़े नेता तो नहीं बने थे. लेकिन उनका नाम भी चर्चा में आना शुरू हो गया था. बड़ा दांव उन्होंने खेला 1974 में. विधान परिषद् के चुनाव होने थे. कांग्रेस के हरिशंकर तिवारी मैदान में थे. कांग्रेसी उन्हें पसंद तो नहीं करते थे, पर कोई विरोध भी नहीं कर सकता था.

तब वीर बहादुर सिंह ने उनके खिलाफ किसी को चुनाव लड़वाने की ठानी. उन्होंने यादवेंद्र सिंह से संपर्क किया और बस्ती के शिवहर्ष उपाध्याय को हरिशंकर तिवारी के खिलाफ उतारा. शिवहर्ष ने हरिशंकर तिवारी को ग्यारह वोटों से हरा दिया. इसके खिलाफ तिवारी हाई कोर्ट गए. शिवहर्ष का टर्म भी खत्म हो गया लेकिन मुकदमा चलता रहा. हरिशंकर तिवारी और वीर बहादुर के बीच ठन गई और ये दूरी बनी रही. लेकिन ये एक तरह से वीर बहादुर की पहली बड़ी जीत थी.

वीर बहादुर छात्र राजनीति से निकले थे. उनके ख़ास लोग ओम प्रकाश पाण्डेय और ब्रज भूषण सिंह भी छात्र राजनीति से आते थे. इन लोगों को राजनीति आती थी. 1980 में वो वीपी सिंह की सरकार में मंत्री बन गये. फिर 24 सितम्बर 1985 से 24 जून 1988 के बीच यूपी के सीएम रहे. बाद में राजीव गांधी की कैबिनेट में कम्युनिकेशन मिनिस्टर भी बने.

ये सब हुआ तो, लेकिन उसी दौरान बहुत कुछ हुआ. और आज वही रोचक किस्सों के तौर पर हाज़िर है.

1980 तक वीपी की सरकार में मंत्री बनने के बावजूद वो कुछ खास नहीं थे. राजीव गांधी की भी पसंद नहीं थे. पर ऐसा कहा जाता था कि अरुण नेहरू से नजदीकियों के चलते उनको मुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया था. पर 24 सितंबर 1985 को उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही कहा जाने लगा कि अब इनके वनवास के दिन नजदीक आ गये हैं.

पार्टी के लोग वीर बहादुर को कुछ ख़ास पसंद नहीं करते थे. उन्हें लगता था वीर बहादुर को जबरदस्ती राज्य पर थोपा गया है. वीर बहादुर भले सीधे सादे बने रहते थे. लेकिन थे तिकड़मी. जो लोग उनकी आलोचना करते थे. उन्हें धीरे-धीरे उन्होंने बाहर निकलवाना शुरू किया. वीर बहादुर कहते थे, ”ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग राजनीति में जन्म लेते ही विधायक बन जाना चाहते हैं और विधायक बनते ही मंत्री.”

कांग्रेस में उनके आलोचकों में दो लोग थे, सुनील शास्त्री और संजय सिंह. इन्हें वीपी सिंह का आदमी माना जाता था. वीपी सिंह की चर्चा करने पर वीर बहादुर भड़क जाते थे. सारी स्थितप्रज्ञता निकल जाती थी.

कभी वीपी सिंह की ही सरकार में मंत्री रहने वाले वीर बहादुर उनके बारे में कहते थे, ‘‘कौन वीपी सिंह? एक पब्लिक मीटिंग कर लें अपने दम पर, फिर हम देखेंगे. कोई फॉलोविंग नहीं है उनकी. इतना कमजोर नेता तो इस राज्य में कभी जन्मा ही नहीं है. कांग्रेस के कैंडिडेट से वो किसी भी सीट पर लड़ लें, पता चल जाएगा.”

वैसे बता दें कि वीर बहादुर के जाने के एक साल बाद वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने थे.

इससे पहले जब वीपी सिंह ने जब कांग्रेस से बगावत कर केंद्रीय मंत्रिमंडल छोड़ा तो उनके साथ राज्य के सैकड़ों विधायक डिनर पर गये. राज्य के चार मंत्रियों और 18 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और वीपी की जन मोर्चा जॉइन कर ली थी.

कमजोर मुख्यमंत्री माने जाते थे, पर टिके रहने की कला थी… जी हां… वीर बहादुर सिंह के शासन काल में 37 जिलों में दंगे हुए. मेरठ के दंगों में 181 लोग मरे. अयोध्या विवाद शुरू हो गया. 16 लाख सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर चले गए. सिनेमा थिएटरों समेत 29 संस्थानों ने हड़ताल की. राज्य में ऐसा सूखा पड़ा जो पूरी शताब्दी में नहीं पड़ा था. किसानों के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के आह्वान पर पूरी ग्रामीण जनता हथियार उठाने के मूड में थी.

पर वीर बहादुर के पास हथियार बहुत थे. सत्ता अपने पास रखना उनको आता था. अपने आलोचकों नकवी और संजय सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया. इस्तीफ़ा देने के बाद संजय सिंह ने वीर बहादुर पर तंज कसा कि, ”मैं वीर बहादुर को धन्यवाद करता हूं. उनकी मेहनत के बिना मैंने पार्टी छोड़ी नहीं होती. वे ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनके लिए हम प्रार्थना करेंगे कि वे हमेशा उत्तर प्रदेश की कुर्सी पर बने रहें.” वीर बहादुर ने तो संजय को बहुत पहले से ही वीपी का पिट्ठू घोषित कर रखा था.

राजीव गांधी को भी वीपी सिंह घेर रहे थे. वीर बहादुर कमजोर लग रहे थे. जब से वीर बहादुर सीएम बने थे, लोगों को यही लगता था कि वो अब गए कि तब गए.

लेकिन वीर बहादुर टिके रहे. पूरे आत्मविश्वास से कहते थे, ”मैंने ये हैसियत पाने के लिए लगभग 30 साल संघर्ष किया है. प्रधानमंत्री का मुझमें भरोसा है और इसी कारण राज्य में स्थिर सरकार है.’‘

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अपने डेली दरबार में वीर बहादुर गप्पें खूब मारते थे. एक बार की बात है. एक लड़का उनके पास कोई याचना लेकर आया था. वीर बहादुर ने उसको अपने पास बैठाया और फिर बातों में रम गये. लड़के का लेटर हाथ में लिए थे. इधर-उधर घुमाते रहे. घुमा-घुमा के मूंगफली का दोना बना दिया. फिर तिकोना करके कान साफ करने लगे. फिर लड़के के सामने ही उसे डस्टबिन में फेंक दिया. फिर लड़के से बोले- तुम जाओ. मैं देखता हूं, क्या कर सकते हैं.

राज्य की ग्रोथ रेट 6 परसेंट से घटकर 3.6 परसेंट हो गई थी. पंचायतों के चुनाव नहीं हो रहे थे. मुख्यमंत्री आश्वासन दे रहे थे, पर करवा नहीं रहे थे. अफसरों के मुताबिक, इन सबके बावजूद मुख्यमंत्री को कोई फर्क नहीं पड़ता था. अपने ऑफिस या घर में वीर बहादुर हमेशा खादी पहने नेताओं और ग्राम प्रधानों से घिरे रहते थे. पत्रकार भी जुटे रहते थे. एक अफसर को तो भगा भी दिया गया था, क्योंकि लोग आए थे मिलने.

जब नवंबर 1986 और सितंबर 1987 में सरकारी कर्मचारियों ने हड़ताल किया, तो वीर बहादुर का सिंपल तरीका था. मामला बढ़ने दो. यूनियन में टूट-फूट का इंतजार करो. मौका मिलते ही रगड़ दो. पर अंत में सरकार को कोई फायदा नहीं हुआ.

यूनियन की सारी बातें माननी पड़ीं. विपक्ष में बैठी भाजपा नेता कल्याण सिंह ने कहा था- मुख्यमंत्री हर बात को बढ़ा देते हैं. और हर मांग मान लेते हैं. वो केंद्र में साबित करने की कोशिश करते हैं कि देखो अकेले मैंने सब कर दिया.

वीर बहादुर की दूसरों को ब्लेम करने की अदा पर सब फिदा थे. मार्च 1986 में हुए दंगों की जिम्मेदारी विश्व हिंदू परिषद पर डाली. जैसे सरकार का कोई रोल ही नहीं था. केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई पर मेरठ दंगों की जिम्मेदारी डाली. सिनेमा वालों की स्ट्राइक की जिम्मेदारी वीपी सिंह पर जाली. सरकारी कर्मचारियों के स्ट्राइक की जिम्मेदारी अपने कुछ कैबिनेट मंत्रियों पर डाली.

फरवरी 1986 को राजीव गांधी ने जब बाबरी मस्जिद का गेट खुलवाया. इसके बाद से कई सारे दंगे हुए. 1987 में जब मेरठ में दंगे हुए तब वीर बहादुर पर हिन्दू समर्थक होने का आरोप लगा. इस बात से वो मना भी करते रहे. सफाई में कहते थे, ”दंगा तो हमारी राष्ट्रीय समस्या है. 1982 के दंगों में इससे ज्यादा लोग मारे गए थे.”

पर सरकार के विभागों की सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर रखी थी. 26 पोर्टफोलियो संभालते थे, जिनमें 72 डिपार्टमेंट थे. बाकी में भी हाथ डाले रहते थे. एक कैबिनेट मिनिस्टर ने कहा था- छोटी-छोटी बातों में भी अपनी टांग अड़ा देते हैं मुख्यमंत्री. इसके अलावा एक और तरीका था उनके पास. मंत्रियों के सेक्रेटरी वो अपनी पसंद का रखते. सेक्रेटरी खूब पंगा करते.

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एक-दूसरे को भिड़ाकर अपनी राजनीति करने वाले वीर बहादुर गांधी परिवार के प्रति बहुत श्रद्धा रखते थे. वो राजीव गांधी की नज़रों में बने रहने के लिए आधे दिन दिल्ली में ही बिताते थे. ऐसा कहा जाता था कि जब भी वक्त मिलता दिल्ली पहुंच जाते. अपने पहले चार महीनों में वो 58 दिन दिल्ली में ही रहे थे. अप्रैल 1985 में उन्होंने कुछ यूं यात्राएं की थीं-

11 अप्रैल की सुबह दिल्ली पहुंचे. 13 की रात वापस लखनऊ आ गये. 14 की सुबह फिर दिल्ली पहुंचे. 15 की रात वापस आ गए. 16 की सुबह फिर दिल्ली. चार दिन बाद वापस. अगले दिन फिर दिल्ली. चार दिन बाद फिर वापस.

हां… उस समय ये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. खैर, रात गई. बात गई.

नमस्कार…

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