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कोरोना के बढ़ते प्रकोप के चलते देश की अर्थव्यवस्था बिल्कुल चरमरा चुकी है. सारी योजनाएं लगभग-लगभग ध्वस्त होती नज़र आ रही हैं. इन परिस्थितियों सबसे ज्यादा बुरा हाल मज़दूरों का हो चला है. अब बस उम्मीद है, तो सिर्फ एक योजना से. और वो है मनरेगा.

दरअसल, कोरोना काल में संकट के बीच ग्रामीण इलाकों में मजदूरों को मनरेगा का बड़ा सहारा मिला है. इस योजना के ज़रिए ही कोरोना काल रोजगार संभव हो सका है.

वहीं अब इस योजना को सरकार शहरी इलाकों में भी लाने पर सरकार विचार कर रही है. इससे लॉकडाउन में बेरोजगार हुए शहरी मजदूर को रोजगार मिल पाएगा.

लॉकडाउन

दरअसल, शहरी इलाकों में मनरेगा लागू होने से एक बड़ी आबादी को रोजगार मिल पाएगा. क्योंकि देश में बड़े पैमाने पर शहरी इलाकों में भी मजदूर रहते हैं, जिन्हें कोरोना संकट की वजह कामकाज नहीं मिल रहा है. खबरों के मुताबिक, सरकार इस योजना को शुरुआती चरण में छोटे शहरों में लागू करने पर विचार कर रही है.

इसके पीछे सोच यह है कि बड़े शहरों में आमतौर पर प्रशिक्षित या जानकार कामगारों की जरूरत ज्यादा होती है. जबकि छोटे शहरों में दिहाड़ी कामगारों के लिए प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती है. सरकार शुरुआत में इस योजना पर 3,5000 करोड़ रुपये खर्च करने की सोच रही है. सरकार इसपर पिछले साल से ही काम कर रही है.

इसपर जानकारों का कहना है कि शहरों में मनरेगा लागू होने से अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिल सकेगी. अगस्त में शहरी बेरोजगारी दर 9.83 फीसदी दर्ज की गई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी दर का आंकड़ा 7.65 फीसदी रहा. जुलाई में शहरी बेरोजगारी दर 9.15 फीसदी थी, और ग्रामीण बेरोजगारी दर 6.6 फीसदी थी.

लॉकडाउन

बता दें केंद्र सरकार ने बजट 2020-21 में मनरेगा के लिए 61,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था. लेकिन कोरोना संकट को देखते हुए सरकार ने फिर इस योजना के लिए अलग से 40 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया है. हाल ही में भारत सरकार ग्रामीण मंत्रालय ने मनरेगा मजदूरों की मजदूरी बढ़ाकर 202 रुपये प्रतिदिन कर दी है. मनरेगा योजना में मजदूरों को अधिकतम 100 दिन तक रोजगार की गारंटी दी जाती है.

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