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राजनीति में कई काल खण्ड ऐसे भी रहे हैं. जब सियासत को सरेराह शर्मिंदा होना पड़ा है. और वो महज़ इत्तेफाक नहीं, सोची समझी साजिश रही थी. और बस यही बात समझने के बाद संसद के पटल पर ज़ोरदार बदलाव हुआ. वो बदलाव था सरकार का बदल जाना।

खैर, हिंदुस्तान की सियासत को समझने में बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित एकतरफ़ा विफल हुए हैं. यही वजह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जब भी सत्ताधारी पार्टी ने लोकतंत्र को ‘ठिकाने’ लगाने की कोशिश की. तब लोकतंत्र ने ही साहिबे मसनद की सत्ता को ‘ठिकाने’ लगा दिया है.

तो आज की बात. सत्ता और कुर्सी की ज़ोरदार उठापटक की. वो भी एक पत्रकार की जुबानी।

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वैसे तो आपातकाल का वो दौर तमाम लोगों को याद है। जब इंदिरा गांधी के एक इशारे पर पूरा देश थम गया था। आपातकाल के दौर में ‘पत्रकारिता’ से होना सबसे बड़ी गलती मानी जाती थी, और जमकर पत्रकारों का दमन होता था।

उस 21 माह के दौर में एक युवा पत्रकार खुद अपना अखबार निकाला करते था, पर बाद में एक नामचीन अखबार के संपादक पद से सेवानिवृत्त हुए।

उस युवा पत्रकार के मुताबिक, उस समय मैं कानपुर में हुआ करता था। हमारा नौजवान खून उबाल मारता था। पत्रकारिता से जुड़े थे, तो सामाजिक बदलाव और क्रांति का जिम्मा अपनी ही जिम्मेदारी समझते थे। हमनें संपूर्ण क्रांति और जेपी से लेकर मजदूरों के आंदोलन को खूब छापा। अखबार का नाम था ‘नया मोर्चा’। जो साप्ताहिक था। पर कानपुर में एक जाना माना नाम बन चुका था।

आगे बताते बताते हैं कि आपातकाल का विरोध हमने भी किया था। तब हम एक अखबार निकालते थे ‘नया मोर्चा’ के नाम से। हम इस साप्ताहिक अखबार की 500 कापी छापते थे। लागत आती थी ढाई सौ रूपये। 8 आने प्रति कापी की दर से खुद ही साइकिल पर लाद कर बेच आते थे। खुद ही संपादक, खुद ही प्रकाशक और स्वयं का लिखा कंटेंट और हॉकर भी खुद ही। कानपुर में आईआईटी और मेडिकल कालेज के छात्र अपने रेगुलर ग्राहक थे।

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आपातकाल लगते ही सभी पत्रकारों की जब धरपकड़ शुरु हुई, तो हमारे साथी भूमिगत हो गए। पत्रकार अपने साथियों मोना, सुमन, दिनेश का नाम लेते हुए कहते हैं वो आपातकाल के दौर पर कहां रहे, उन्हें नहीं पता। पर जब आपातकाल का दौर खत्म हुआ, और नागरिक अधिकार खुले में अपनी सांसे लेने लगे। तब तक वो खुद विवाह बंधन में बंध चुके थे।

आपातकाल के दौर को याद करते हुए पत्रकार बताते हैं कि उस समय पुलिस और नौकरशाहों के पास अथाह शक्ति थी। कोई छोटी सी बात पर भी विरोध कर दे, तो मीसा लगाकर अंदर कर दिया जाता था।

हालांकि, आम लोगों को इससे कोई मतलब नहीं था। कानपुर की ही बात करूं तो सबकुछ सामान्य था। तब राशन और चीनी सरकारी दुकानों पर मिलते थे। सभी दुकानें समय पर खुलने लगी। सरकार के डंडे की वजह से कालाबाजारी पर पूर्ण नियंत्रण लग गया। गुंडे-बदमाश सभी भूमिगत हो गए।

पत्रकार के अनुसार, मेरा घर यमुना किनारे पड़ता था। चंबल का इलाका भी ज्यादा दूर नहीं था। वहां आपातकाल से पहले डकैतों की तूती बोला करती थी। पर उस दौर में डाकुओं की भी बोलती बंद थी। अपराध मानों थम सा गया हो।

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दरअसल, आंतरिक आपातकाल दो ही वजहों से ज्यादा बदनाम हुआ। पहली वजह तो राजनीतिक थी। जब विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं से बोलने की आजादी छिन गई। विरोध करने पर जेल भेजा गया। और दूसरी वजह थी नसबंदी।

हालांकि, मेरे सामने ऐसी कोई घटना नहीं हुई, पर एक-दो नौजवानों के बारे में सुना तो काफी दुख हुआ।

इतना सबकुछ होकर भी आम जनता खुश थी। या कहें कि शांत थी। इंदिरा गांधी को लगने लगा था कि देश उन्हें ही मसीहा मान चुका है। उन्हें लगता था कि जनता उनके साथ ही खड़ी रहेगी। क्योंकि सरकारी दमन के डर से सामाजिक अपराध पूरी तरह से थम से गए थे। दान-दहेज पूरी तरह से रुक गया था। 10 लोग बारात में जा सकते थे। कालाबाजारी करने वालों को जेल में भेज दिया गया। ऐसे में इंदिरा को लगा कि वो भारत में एक और सामाजिक क्रांति कर चुकी हैं। पर शायद वो गलत थी। और नतीजा चुनाव के बाद सामने भी आ गया।

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और… मैडम गांधी को कुर्सी छोड़नी पड़ गई.

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