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हिन्दुस्तान की सरजमीं पर न जाने कितने वीर योद्धाओं ने जन्म लिया. जिन्होंने अपने वतन की हिफाज़त के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी. वीर भूमि के रणबांकुरों ने जहां स्वतंत्रता पूर्व के आन्दोलनों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. वहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की लड़ाइयों में भी झुंझुनूं जिले की माटी में जन्मे सेनानी देश की धरोहर साबित हुए हैं.

आज हम बात करने जा रहे हैं राजस्थान के झुंझुनूं जिले की… चारो तरफ फैले बीहड़ की माटी ने देश को ना जाने कितने सपूत दिए हैं. यहां की धरती ने सदियों से जन्म लेते रहे सपूतों के दिलों में देशभक्ति की भावना को जगा के रखा है. शहादत राजस्थान की परम्परा है. यहां गांव-गांव में लोक देवताओं की तरह पूजे जाने वाले शहीदों के स्मारक इस परम्परा के प्रतीक हैं.

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इस जिले के वीरों ने बहादुरी का जो इतिहास रचा है उसी का परिणाम है कि भारतीय सैन्य बल में उच्च पदों पर राजस्थान की ओर से झुंझुनूं का ही वर्चस्व रहा है. वास्तव में यहां की धरती को यह वरदान सा प्राप्त होना प्रतीत होता है कि इस पर राष्ट्रभक्ति के कीर्तिमान स्थापित करने वाले लाडेसर ही जन्म लेते हैं.

चाहे 1948 का कबायली हमला हो या 1962 का भारत चीन युद्ध, चाहे 1965 या 1971 का भारत-पाक युद्ध… यहां के वीरों ने मातृभमि की रक्षा के ;लिए सदैव अपना जीवन बलिदान किया है. जल, थल और वायु तीनों सेनाओं की आन के लिये यहां के नौजवान सैनिकों को राष्ट्र कभी भुला नहीं सकता है.

इस क्षेत्र के सैनिकों ने भारतीय सेना में रहकर विभिन्न युद्धों में बहादुरी एवं शौर्य की बदौलत जो शौर्य पदक प्राप्त किये हैं. वे किसी भी एक जिले के लिये प्रतिष्ठा एवं गौरव का विषय हो सकता है. सीमा युद्ध के अलावा जिले के बहादुर सैनिकों ने देश मे आंतरिक शान्ति स्थापित करने में भी सदैव विशेष भूमिका निभाई है.

सीमा संघर्ष और नागा होस्टीलीटीज हो या ऑपरेशन ब्लूस्टार या श्रीलंका सरकार की मदद के लिए किये गये आपरेशन पवन या फिर कश्मीर में चलाया गया आतंकवादी अभियान रक्षक और कारगिल युद्ध… सभी अभियानों में यहां के सैनिकों ने शहादत देकर जिले का मान बढ़ाया है.

झुंझुनूं जिले में प्रारम्भ से ही सेना में भर्ती होने की परम्परा रही है. यहां गांवों में हर घर में एक व्यक्ति सैनिक होता था. सेना के प्रति यहां के लगाव के कारण अंग्रेजों ने यहां ”शेखावाटी ब्रिगेड” की स्थापना कर सैनिक छावनी बनायी थी. जिले के वीर जवानों को उनके शौर्यपूर्ण कारनामों के लिये समय-समय पर भारत सरकार द्वारा सम्मान से नवाजा जाता रहा है.

खास बात यह है कि अब तक इस जिले के कुल 117 सैनिकों को वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. जोकि पूरे देश में किसी एक जिले के सर्वाधिक हैं.

1971 के भारत-पाक युद्ध में एडमिरल विजयसिंह शेखावत को परम विशिष्ठ सेवा मेडल, अति विशिष्ठ सेवा मेडल, वीर चक्र और आर्मी डिस्पेच सर्टिफिकेट, ले. जनरल कुन्दन सिंह को परम विशिष्ठ सेवा मेडल, ब्रिगेडियर आर.एस. श्योरान को अतिविशिष्ठ सेवा मेडल दिया गया.

सूबेदार दयानन्द, नायक मेघराज सिंह मरणोपरान्त, नायक हरिसिंह मरणोपरान्त, सिपाही रामस्वरूप मरणोपरान्त को कीर्तिचक्र से सम्मानित किया गया.

इसके अलावा जिले के 23 सैनिकों को सेना मेडल, दो को नौसेना मेडल और 14 को मेन्सन इन डिस्पेच से सम्मानित किया जा चुका है.

भारतीय सेना में योगदान के लिये झुंझुनूं जिले का देश में अव्वल नम्बर है. वर्तमान में इस जिले के 45 हजार जवान सेना में कार्यरत हैं. वहीं 62 हजार भूतपूर्व सैनिक हैं. आजादी के बाद भारतीय सेना की ओर से राष्ट्र की सीमा की रक्षा करते हुये यहां के 422 जवान शहीद हो चुके हैं. जो पूरे देश में किसी एक जिले से सर्वाधिक है.

कारगिल युद्ध के दौरान पूरे देश में 527 जवान शहीद हुये थे जिनमें यहां के 22 सैनिक शहीद हुये थे जो पूरे देश में किसी एक जिले से शहादत देने वालों में सर्वाधिक जवान थे. कारगिल युद्ध के बाद से अब तक झुंझुनूं जिले के 114 से अधिक सैनिक जवान सीमा पर शहीद हो चुके हैं.

यहां के जवान सेना के सर्वोच्च पदों तक पहुंच कर अपनी प्रतीभा का प्रदर्शन किया है. इस जिले के एडमिरल विजय सिंह शेखावत भारतीय नौसेना के अध्यक्ष रह चुके हैं. वहीं स्व. कुन्दन सिंह शेखावत थल सेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल और भारत सरकार के रक्षा सचिव रह चुके हैं.

देश में झुंझुनूं एकमात्र ऐसा जिला है. जहां सैनिक छावनी नहीं होने के उपरान्त भी गत पचास वर्षों से अधिक समय से सेना भर्ती कार्यालय कार्यरत है. जिससे यहां के काफी युवकों को सेना में भर्ती होने का मौका मिल पाता है.

यहां के हवलदार मेजर पीरूसिंह शेखावत को 1948 के युद्ध में वीरता के लिये देश के सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है. परमवीर चक्र पाने वाले पीरूसिंह शेखावत देश के दूसरे और राजस्थान के पहले सैनिक थे.

द्वितीय विश्व युद्ध में भी दिखाया था दम

यहां के सैनिकों ने द्वितीय विश्व युद्ध में भी बढ़चढ़ कर भाग लिया था. बता दें आज भी यहां के 406 द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व सैनिकों या उनकी विधवा पत्नियों को सरकार से पेंशन मिल रही है.

जिले के वीर सपूतों को नमन…

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