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हम में से बहुत से लोगों के लिए दिल दहला देने वाला क्षण होता है, जब हम सुनते हैं कि किसी ने आत्महत्या का प्रयास किया है या अपनी जान गंवा दी है. और उस वक्त हम भूल बैठते हैं कि ज़िन्दगी कितनी कीमती है. बस मौत की आगोश में समा जाते हैं. लेकिन इन सबके पीछे कारण क्या होते हैं. कौन जिम्मेदार होता है. ये सब जानना बहुत जरुरी हो जाता है.

वहीं विशेषज्ञों का दावा है कि मानसिक संबंधों, अलगाव, नशीली दवाओं के सेवन, आर्थिक संकट और व्यक्तिगत संबंधों में संघर्ष आत्मघाती विचारों के प्रमुख कारण हो सकते हैं.

suicide

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, हर साल 8 लाख से अधिक लोग आत्महत्या करके अपनी जान गंवाते हैं. इसका मतलब है कि हर 40 सेकेण्ड में एक व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता है. और सबसे गंभीर बात ये है कि, भारत और चीन मिलकर ऐसे मामलों में 40 प्रतिशत का योगदान करते हैं.

हालाँकि, इसकी वास्तविकता भारत में कुछ ज्यादा ही गंभीर है. 130 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) कहता है कि 2019 में प्रतिदिन औसतन 381 आत्महत्या से मौतें हुई, जबकि सालभर में 1.36 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई.

अब 2020 में, कोविड-19 महामारी के कारण स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है. 19 मार्च से 2 मई के बीच लगभग 80 आत्महत्या के मामले सामने आए. मामलों में इस तरह की वृद्धि के बाद, मानसिक स्वास्थ्य के आसपास की बातचीत में तेजी आई है, खासकर युवाओं में.

इस साल विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर, हमारे लिए यह पूछना अनिवार्य हो गया है कि क्या देश में आत्महत्या के मामलों की संख्या को कम करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए जा रहे हैं या नहीं? और भारत की सर्वाधिक आत्महत्या दर के पीछे कारण क्या हैं?

इस चिंताजनक मुद्दे पर विशेषज्ञों ने बड़ी स्पष्ट राय रखी है.

और उनका साफतौर पर कहना है कि देश में चल रही महामारी को एक तरफ रखते हुए, आत्महत्याओं को कई जटिल कारकों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. भारत में बहुत सारे लोग समाज के आर्थिक रूप से कमजोर और हाशिए के वर्गों से हैं. उनके पास सभ्य जीवन जीने के लिए बुनियादी जरूरतों की भी कमी है.

गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा, बेरोजगारी, और बढ़ती ग्रामीण-शहरी विभाजन के लिए दुर्गमता कुछ वास्तविकताएं हैं, जिनसे उन्हें समय-समय पर निपटने की आवश्यकता होती हैं. मानसिक रूप से मजबूत लोग इसे दूर करते हैं, लेकिन दूसरे लोग हार मान लेते हैं.

एक और दबाव वाला मुद्दा जो इसे जोड़ रहा है वह है मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज का रवैया. डिप्रेशन, चिंता के आसपास के कलंक और भेदभाव लोगों को खुलने से रोकते हैं और इसके लिए मदद मांगते हैं. जब तक मानसिक स्वास्थ्य के आसपास की बातचीत, साथ ही साथ इसके बारे में जागरूकता नहीं बढ़ती, तब तक चीजें बदल नहीं सकती हैं.

इसके अलावा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पिछले एक दशक में तेजी से विकसित हुए हैं. यह हमारे जीवन का ऐसा जरुरी हिस्सा बन गया है कि इसने हमें हुक्म देना शुरू कर दिया है. दुर्भाग्य से, कई युवा दिमाग इसके शिकार हो रहे हैं. वे अपने दोस्तों के ‘खुशी भरी फोटोज़ और पोस्ट’ को देखते हैं और उनके जीवन की तुलना करना शुरू करते हैं. ये juxtapositions नकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा देते हैं और असंतोष का कारण बनते हैं.

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और इन्हीं बिंदुओं पर हमें न सिर्फ नज़र डालने की जरुरत है. बल्कि इसे जड़ से ख़त्म करने की जरुरत है. तभी बहुत हदतक तस्वीर बदल सकती है.

फिलहाल, खुश रहें, हँसते रहें और लोगों को हंसाते रहें. नमस्कार

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