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ये बदलता भारत है? सही जवाब पता नहीं। लेकिन जवाब लापता नहीं। क्योंकि ये आधुनिक भारत है। वैसे तो कहते हैं। नाम में क्या रखा है। लेकिन ये वाली बात अब पुरानी हो गई। क्योंकि नाम में बहुत-कुछ रखा है। ऐसा न होता, तो भारत में अंग्रेजी राज से लेकर अब तक पश्चिमी तर्ज के नाम पर अनगिनत स्कूल, कॉलेज, रोड और मोहल्ले नहीं आबाद होते। ये सिर्फ राज की याद ही नहीं दिलाते, इनके बहुत कुछ और मायने भी हैं।

आज भी विश्वविद्यालयों के वेस्टर्न नाम पश्चिम को महत्व देने वाली भारतीय सोच के शुरुआती उदाहरण हैं। खास तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में यह बात साफ नजर आती है। सेंट जेवियर्स, सेंट स्टीफंस, लोयला, प्रेसिडेंसी, एलिफिस्टन- ऐसे नामों वाले संस्थान आपको हर शहर में मिल जाएंगे।

पश्चिमी नाम रखने का चलन इतना आम हो गया कि एक तबके में इसे लेकर भय और विरोध भी पैदा होने लगा। नतीजतन, कुछ नई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज ने अपने नाम जान-बूझकर भारतीय ढंग के रखे। मिसाल के लिए अशोका और विवेकानंद ग्लोबल। कुछ और मसलन, जिंदल और शिव नाडर ने सीधे-सीधे अपने मुख्य दानकर्ताओं के नाम पर यूनिवर्सिटी के नाम रख दिए।

बॉलीवुड का ‘वेस्टर्न’ प्रेम

इस बात की ताईद बॉलीवुड की फिल्में भी करती हैं। उनमें दिखाए जाने वाले स्कूल-कॉलेजों के नाम पर गौर फरमाइए। ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में सेंट टेरेसा, ‘कुछ-कुछ होता है’ में सेंट जेवियर्स, ‘स्टेनली का डब्बा’ में होली फैमिली, ‘थ्री इडियट्स’ में इम्पीरियल कॉलेज, ‘उड़ान’ में बिशप कॉटन, ‘तारे जमीं पर’ में ट्यूलिप्स। यह लिस्ट और लंबी हो सकती है। यहां एक फिल्म अपवाद के तौर पर याद आती है: ‘मोहब्बतें’, जिसमें शिक्षण संस्थान का नाम भारतीय तर्ज पर गुरुकुल है।

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इसकी क्या वजह हो सकती है? एक तो यही कि भारत के तमाम टॉप रैंक वाले शिक्षण संस्थान अब भी ब्रिटिशकालीन हैं। अंग्रेज चले गए, लेकिन उनके नाम नहीं बदले गए। उनके परिसर में ब्रिटिश उपनिवेश की याद दिलाने वाली भव्य बिल्डिंगें आबाद हैं। और यही बॉलीवुड को लुभाता है।

कॉन्वेंट के नाम पर गड़बड़झाला

एक गड़बड़झाला ‘कॉन्वेंट स्कूल’ नाम से भी हुआ है। कॉन्वेंट स्कूल यानी कैथलिक धर्म के नियमों के मुताबिक चलाए जाने वाले स्कूल। इसके लिए कतई जरूरी नहीं कि उनके नाम पश्चिमी तर्ज पर ही रखे जाएं या वहां अंग्रेजी पढ़ाई जाए। मिसाल के लिए क्रिश्चियन ब्रदर्स की तरफ से गुजरात के ग्रामीण इलाके में जागृति हाई स्कूल चलाया जाता है। लेकिन चलन में कॉन्वेंट स्कूल का मतलब हो गया है। अंग्रेजी भाषा में शिक्षा और पश्चिमी नाम।

साल 2010 में कर्नाटक सरकार ने स्कूलों के लिए एक सर्कुलर जारी किया। इसमें कहा गया कि जब आप कैथलिक धर्म नियमों के मुताबिक अपने स्कूल न चला रहे हों, तो उसके साथ ‘कॉन्वेंट स्कूल’ जैसे शब्द जोड़ने में सावधानी बरतें। पुणे का सेंट जोसफ कॉन्वेंट स्कूल भायाराम सीसराम शिक्षण संस्थान चलाता है। उसके चेयरमैन के हवाले से, ‘हमारे लिए कॉन्वेंट स्कूल सिर्फ एक टाइटल है। हमें नहीं लगता कि ऐसे नाम से हम पैरंट्स को इस अंधेरे में रख रहे हैं कि यह स्कूल चर्च चलाता है।’

इंडिया, जो कि भारत बन रहा है

ब्रिटिश राज के समय पश्चिमी तर्ज पर नाम रखने के ये तमाम कारण समझ में आते हैं। लेकिन यह चलन अब तक क्यों है? आजादी के बाद भारतीय नामों की भी वापसी होनी थी। इसकी शुरुआत देश के नाम से ही होनी चाहिए थी। संविधान सभा ने इसके लिए भारत, भारतवर्ष या हिंदुस्तान जैसे नामों पर चर्चा की। मंशा पाकिस्तान की प्रतिक्रिया में एक नाम रखना था। अंत में सभा ‘इंडिया, जो कि भारत है’ पर सहमत हुई।

दोबारा नाम रखने की प्रक्रिया में राज्य भी शामिल हुए। कुछेक राज्यों के नाम बड़ी आसानी से रख दिए गए। मसलन, ईस्ट पंजाब बदलकर पंजाब हो गया, लेकिन वेस्ट बंगाल इसी नाम पर कायम रहा। मध्य प्रांत और बरार के क्षेत्र मध्य प्रदेश बन गए। लेकिन उत्तर प्रदेश का नाम आर्यवर्त, अवध, कौशल और बृज जैसे विकल्पों पर वाद-विवाद के बाद रखा गया।

बीतते वक्त के साथ दोबारा नाम रखने की प्रकिया में तेजी आई। मद्रास तमिलनाडु हो गया, बॉम्बे का नाम महाराष्ट्र और मैसूर अब कर्नाटक के नाम से जाना जाने लगा। कई राज्यों के नाम इसी तरह बदले गए। हालांकि, साल 1960 में वह प्रस्ताव ठकुरा दिया गया, जिसमें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप पुकारने की बात कही गई थी।

नाम में बदलाव से विवाद हुए तो समर्थन के स्वर भी उभरे। मिसाल के लिए मद्रास और बॉम्बे जैसे शहरों के नाम बदलकर जब चेन्नै और मुंबई कर दिए गए तो दोनों तरह के स्वर सुनाई पड़े। लेकिन लोग स्टेट और शहर के स्तर पर नाम बदली को लेकर बहुत कुछ कर नहीं सकते। मीडिया में शिकायती चिट्ठी लिखने या अपनी निजी बातचीत में शहर या राज्य को उसके पुराने नाम से पुकारते रहने के अलावा उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं।

हालांकि, यही बात उनके पास-पड़ोस में होन वाले बदलावों पर लागू नहीं होती। उस स्तर पर नाम बदलने से बड़े तगड़े नागरिक प्रतिरोध भी उभर सकते हैं। मिसाल के लिए खोताचीवाड़ी। यह मुंबई का एक ऐसा इलाका हैं, जिसमें ज्यादातर पुराने ढंग के घर आबाद हैं।

इन घरों के बाशिंदों ने पहले तो इलाके को फिर से डिवेलप करने की योजनाओं का विरोध किया। इसके बाद जब बॉम्बे म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ने इसका नाम बदलकर मराठी पत्रकार अपा पेंडसे करना चाहा, तो इसका जबरदस्त विरोध हुआ। इस विरोध ने इतना जोर पकड़ा कि बीएससी को नामकरण का आयोजन रद्द करना पड़ा।

गलत नहीं हैं लोग

लोगों को इस मामले में गलत नहीं ठहराया जा सकता। एक जगह के नाम बदलने के पीछे अगर सही तर्क हों, तो लोग उन्हें स्वीकार करने में नहीं हिचकते। मिसाल के लिए 1961 में फ्रेरे रोड का नाम बदलकर ऑल-इंडिया पोर्ट और डॉक वर्कर्स फेडरेशन के संस्थापक पी. डीमेलो रोड कर दिया गया। डीमेलो का उस इलाके के साथ बहुत गहरा रिश्ता था। लोगों ने इसे स्वीकार किया।

लेकिन यही बात पेडर रोड पर लागू नहीं हुई। पेडर रोड का नाम बदलकर मेयर गोपाल देशमुख कर दिया गया। वह एक भूला हुआ किरदार थे और लोग इस नए नाम को कभी स्वीकार नहीं पाए।

इसी तरह का एक जटिल मसला मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ है। इसका नाम बदलकर डॉक्टर आंबेडकर करने पर 16 बरस का लंबा आंदोलन चला। इसे नामांतर आंदोलन के नाम से जाना गया। मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी बहुत पुराना नाम नहीं था। साल 1958 में इसे स्थापित किया गया था और आंबेडकर का इस इलाके से जुड़ाव भी रहा। लेकिन उनकी दलित पहचान के खिलाफ विरोध के स्वर उभरे।

समर्थन और विरोध में कई उग्र प्रदर्शन हुए। कुछ खुदकुशी के भी मामले सामने आए। तब जाकर डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी के नाम पर सहमति आम सहमति बनी।

स्थानीय लोगों से बगैर सलाह लिए राजनीतिक कारणों से रातोंरात संस्थानों के नाम बदलने की प्रवृत्ति गुस्से और विरोध-प्रदर्शन के रूप में सामने आती है। मिसाल के लिए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने भोपाल विश्विद्यालय का नाम बदलकर बरकतउल्लाह यूनिवर्सिटी कर दिया। इसके लिए किसी से सलाह की जरूरत भी नहीं समझी।

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कई विश्विविद्यालयों ने इस तरह नाम बदलने की प्रवृत्ति का विरोध किया। यही वजह है कि गुलबर्ग यूनिवर्सिटी का नाम अब तक बसवेश्वर नहीं रखा जा सका। इसी तरह कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी भी हरियाणा के पूर्व गवर्नर बीरेंद्र नारायण चक्रवर्ती के नाम पर रखने का विरोध किया।

राजनीतिक दुरुपयोग

कांग्रेस पार्टी नाम बदलने में सबसे आगे रही है। खीज तब होती है, जब वह तमाम संस्थानों के नाम गांधी-नेहरू परिवार पर रखती जाती है। इसके लिए हर बार परिवार को ही दोष नहीं दिया जा सकता, लेकिन इस मुल्क में चाटुकारिता की संस्कृति को बढ़ावा देने की कुछ जिम्मेदारी उस पर डाली ही जा सकती है।

बीजेपी यह दावा कर सकती है कि वह तो अपने आदर्श दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर ही संस्थानों का नाम रखती है, लेकिन इससे उन लोगों की मुसीबत कम नहीं हो जाती, जो राजनीतिक कारणों से बदले गए इन नामों से परेशानी की चपेट में आ जाते हैं।

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इन बदलावों की तुलना में पुराने पश्चिमी या ऐेसे ही मिलते-जुलते नाम लोगों को कम कुटिल लगते हैं। स्थानीय लोग इन नामों पर कम ही ध्यान देते हैं। यह शायद नाम रखने के पीछे की राजनीति है, जिसने भारत में पश्चिमी नामों की जगर-मगर रखी है।

लेकिन इस बदलते भारत में पुनर्नामकरण को हमेशा तवज्जों दी जाती थी। दी जाती है। और दी जाती रहेगी। (राजनीति जो करनी है)।

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