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हाथरस में क्या है? सिसायत की आड़ में कई राज दफ़्न होने की कगार पर हैं. आलम ये है कि बड़ी संख्या में पुलिस है, फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ हैं, एम्बुलेंस हैं, बैरीकेडिंग है, प्रशासन के आला अफसर हैं. बावजूद इसके भयमुक्त समाज की भावना दम तोड़ रही है. हालात ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जिसमें न विपक्ष उस बैरीकेडिंग को पार कर सकता है न मीडिया. रात-दिन का पहरा है. लेकिन आखिर क्यों? क्यों है ये सब?

इस पहरे से सवाल भी उभर रहे हैं. हाथरस के जिस इलाके को छावनी में बदला गया है. उसके पीछे क्या वजह है? क्यों मीडिया को भी वहां जाने की इजाज़त नहीं है? आखिर वह कौन से राज़ हैं जिनकी पर्देदारी है.

हाथरस की 19 साल की लड़की 14 दिन तक अस्पताल के बेड पर ज़िन्दगी से संघर्ष करती रही. लेकिन तब न पुलिस थी, न मजिस्ट्रेट थे, न बैरीकेडिंग थी, न विपक्ष के सवाल थे. लेकिन उसकी मौत के बाद सवालों के जवाब तलाशने के बजाय रात के अँधेरे में लाश को जला देने की जल्दी थी.

पोस्टमार्टम

यह सवाल तो उभरेंगे ही ना कि आखिर रात के अँधेरे में लड़की को क्यों जला दिया गया? जो काम घर वालों को अंजाम देना था उसे पुलिस ने क्यों अंजाम दिया. मौत के फ़ौरन बाद जब सरकार ने परिवार के एक सदस्य को नौकरी और 25 लाख मुआवज़े का एलान कर ही दिया तो फिर वह कौन से राज़ हैं जिन्हें लोगों को नहीं जानना चाहिए? कौन से राज़ हैं जो मीडिया ने जन लिए तो सरकार मुसीबत में पड़ जायेगी.

सरकार तो लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई है. सरकार का कार्यकाल अभी डेढ़ साल बाकी है फिर आखिर क्यों विपक्ष पर बंदिश है. राहुल और प्रियंका हाथरस पहुँच जाते तो कौन सा माइलेज ले लेते. टीएमसी संसद अगर परिवार से मिल लेते तो कौन सा पहाड़ टूट जाता. मीडिया अगर उस लड़की की माँ के आंसू पोंछ लेता तो सरकार की कौन सी किरकिरी हो जाती?

हाथरस की सड़कों पर सवालात बिखरे पड़े हैं. बैरीकेडिंग लगाकर उस घर का रास्ता इस तरह से रोका गया है जैसे कि कोई बहुत बड़ा खतरा आने वाला हो? उसी खतरे की जानकारी ही तो यह देश चाहता है. सरकार ने जब फ़ौरन मुआवज़े का एलान कर दिया तो फिर सरकार की किरकिरी हो जाने का खतरा क्यों है?

ऐसा किसी सरकार में नहीं हुआ कि किसी को पीड़ित के घर जाने से रोका गया हो. लोकतंत्र में सरकार को व्यवस्था संभालने का हक़ है लेकिन विपक्ष सवाल पूछकर सरकार को सही रास्ता दिखाने का काम करता है.

ऐसे में यह सवाल तो उठेगा ही कि आखिर एक एसडीएम क्या इतना पॉवरफुल हो सकता है कि वह एक सांसद को धक्का देकर गिरा दे? क्या एक एसीपी इतने बड़े पद वाला होता है कि वह किसी राष्ट्रीय पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद का गरेबान पकड़ ले?

क्या पुलिसकर्मियों को यह अधिकार होता है कि वह मीडिया को मौके पर जाने से रोकने के लिए रिपोर्टर और कैमरामैन को ज़बरदस्ती पकड़कर पुलिस की जीप में ठूंसकर मौके से दूर ले जाकर छोड़ दे? ऐसे में सवाल तो उठेगा ही न कि आखिर किस राज़ की पर्देदारी है.

पोस्टमार्टम

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय लल्लू हाथरस के हालात को लोकतंत्र की हत्या बताते हैं. वह कहते हैं कि अघोषित इमरजेंसी लगी है. लड़की की हत्या के बाद तथ्यों को छुपाने की कोशिश हो रही है. माँ-बाप को बंधक बना लिया गया है. सरकार इस कदर डर गई है कि इस मामले का कोई तथ्य खुल न जाए इस डर से किसी को भी मौके पर जाने नहीं दे रही है. वह कहते हैं कि लाठी-डंडों के बल पर सरकार चलाने की कोशिश हो रही है. सरकार बुरी तरह से डर गई है इसीलिये सब कुछ छुपाकर रखना चाहती है.

वहीं बीजेपी के प्रवक्ता अश्वनी शाही कहते हैं कि अगर सुरक्षा व्यवस्था में ज़रा भी ढील दे दी जाए तो हाथरस में जातीय दंगे फ़ैल सकते हैं. सरकार को ऐसी रिपोर्ट मिली है. दंगों से हाथरस को बचाने के लिए सख्ती की जा रही है. पुलिस और प्रशासन ने उस रिपोर्ट को पूरी संजीदगी से लिया है इसीलिये पूरे इलाके को छवनी में बदला गया है.

शाही कहते हैं कि मीडिया चौथा स्तम्भ है. दो-एक दिन में माहौल शांत हो जायेगा तो उसे जाने देंगे. विपक्ष को भी नहीं रोकेंगे. फिलहाल विपक्ष और मीडिया दोनों को धैर्य रखना चाहिए. सरकार पर भरोसा रखने की ज़रूरत है. सरकार दोषियों को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ेगी. सरकार कुछ भी नहीं छुपाएगी लेकिन हालात अभी ठीक नहीं हैं इसलिए विपक्ष और मीडिया दोनों को सहयोग करना चाहिए.

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद एबाद को लगता है कि इस मामले में कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर है इसी वजह से लड़की के परिवार को बंधक बना लिया गया है. सरकार नहीं चाहती कि असली राज़ खुलकर सामने आये. सरकार नहीं चाहती कि इस मामले में मीडिया कुछ भी दिखाए.

विपक्ष क्या इल्जाम लगा रहा है यह अलग बात है लेकिन मीडिया को रोकने के पीछे कौन सी वजहें हैं उन वजहों पर पड़ा पर्दा तो हटना ही चाहिए. सिर्फ मीडिया ही क्यों निर्भया का केस लड़कर उसे इन्साफ दिलाने वाली वकील सीमा के साथ जिस तरह से हाथरस के एडीएम ने बदतमीजी की उससे भी लगता यही है कि कुछ गड़बड़ तो है. सीमा को भी मीडिया की तरह से लड़की के घर नहीं जाने दिया गया. जो भी वहां पहुंचा उसे बताया गया कि ऊपर से आदेश है. कितने ऊपर से आदेश है यह बताने वाला कोई नहीं है.

लड़की मर चुकी है. रेप हुआ या नहीं हुआ इसका जवाब तो पुलिस द्वारा जलाई गई चिता में जल गया. मुआवजा देकर सरकार ने अपना फर्ज़ पूरा कर दिया है. एसआईटी को जांच सौंप ही दी गई है. बताया जा रहा है कि एसआईटी मौके से सबूत जुटा रही है इसीलिये मीडिया को नहीं जाने दिया जा रहा है.

सवाल यही है जो परेशान करने वाला है कि लड़की 14 दिन अस्पताल के बेड पर ज़िन्दगी के लिए संघर्ष कर रही थी उसी दौरान एसआईटी सबूत जुटाने गई होती तो शायद कुछ मिल भी गया होता. एसआईटी गठित हो जाती तो वह लड़की खुद भी बहुत कुछ बता देती.

पुलिस लाश को न जलाती तो उसका फिर से पोस्टमार्टम कराकर विपक्ष का मुंह बंद किया जा सकता था लेकिन हर काम में बहुत जल्दी थी. इस जल्दबाजी के बहुत से मायने हैं. सवाल तो उठेगा ही कि आखिर वो कौन से राज़ हैं जिसकी पर्देदारी है.

मीडिया

योगी सरकार की पुलिसिया रवैये ने गहरी खाई पैदा कर दी है. समाज सशक्त की बजाय शांत है. क्योंकि फर्जी मुक़दमे और लाठी-डंडो का डर है. लेकिन सवाल आज भी वही है. आखिर वो कौन से राज़ हैं, जिसपर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है?

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