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देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कहा कि आत्मनिर्भर बनें। तब से ऐसा लग रहा है कि इस शब्द को मौजूदा स्थिति में अगर कोई सार्थक कर रहा है, तो वो हैं देश के बड़ी से बड़ी इमारतों में (जिसके नीचे आज उनका कुछ देर तक टिक पाना नसीब नहीं) अपना खून-पसीना लगाने वाले मज़दूर। जो आज ‘आत्मनिर्भर’ दिखते हैं?

lockdown

वैसे तो लॉकडाउन के दौरान देशभर से मजदूरों की तस्वीरें सामने आ रही हैं. वो तस्वीरें बेचैन करती हैं. वो तस्वीरें रुलाती हैं. वो तस्वीरें सरकारी सिस्टम को कोसती हैं. मगर फिर ना जाने क्यों यही तस्वीरें मजबूर करती हैं कि इन लोगों की बेचारगरी और लाचारगी पर अफसोस करने या आंसू बहाने की बजाए फख्र करें.

फख्र करें क्योंकि वे मजदूर हमें सिखा भी रहे हैं और बता भी रहे हैं कि असल में ‘आत्मनिर्भर’ होने का मतलब क्या है? मत दो ट्रेन, रहने दो बसों को, साइकिल-मोटरसाइकिल, बैलगाड़ी भी नहीं हो तो क्या, पैदल ही भारत नाप लेंगे.

लॉकडाउन

दर्द की कोई ज़ात नहीं होती. आंसुओं का कोई मज़हब नहीं होता. और ग़म का कोई इलाका नहीं होता. बस, कोरोना के दर्द आंसू और ग़म को देखना और समझना हो, तो बस मजदूरों की तस्वीरें देख लीजिए. कोरोना के बंद भारत में जब सारे पहिए बंद हो गए, शहर के चूल्हे ठंडे पड़ गए तो ये हज़ारों-लाखों बेबस लोग पैदल ही अपने गांव की तरफ़ चल पड़े.

हमेशा ऐसा क्यों होता है कि हर दौर में हाकिम को सिर्फ़ हुकूमत चाहिए. ताकत चाहिए. लोग नहीं. काश हाकिम लोग एक बार इस तस्वीर को देख लें तो क्या पता हुकूमत से नफ़रत हो जाए और इंसानियत से प्यार.

130 करोड़ हिंदुस्तानियों में इनकी आबादी 80 से 90 करोड़ है. एक तिहाई हिंदुस्तान इन्हीं की वजह से आबाद है. पर इसके बावजूद हम और आप इन्हें किसान और मजदूर कहते हैं. बस, इतना ही जानते हैं हम सब इनके बारे में. आपके लिए ये भूखे-नंगे-बेघर लोग हो सकते हैं. मगर जिन घरों में आप रहते हैं ना, वो यही बनाते हैं. जिन सड़कों पर आप गाड़ियां दौड़ाते हैं, वो ये बनाते हैं. जो कपड़े आप पहनते हैं, वो यही सीते हैं. जो सब्ज़ी आप खाते हैं, वो यही उगाते और बेचते हैं. नहीं जानते हैं आप इन्हें. ज़रूरत भी क्या है.

मारे गए… नहीं था कोरोना

300 से ज़्यादा लोग बिना कोरोना से संक्रमित हुए मारे गए. कौन हैं ये लोग. जी.. ये मज़दूर और किसान ही हैं. जो भूख मिटाने के लिए अपने घर-बार छोड़कर बड़े बड़े शहरों में पलायन कर गए थे. रोज़ कमाने और खाने वाले इन लोगों का लॉकडाउन ने काम छीन लिया. तो रोटी खुद ब खुद छिन गई. लिहाज़ा परदेस में भूख से मर जाने से बेहतर इन्होंने वतन लौटना समझा. इस जद्दोजहद में कुछ ट्रेन से कट कर मर गए. कुछ को तेज़ रफ्तार गाड़ियों ने कुचल डाला. कुछ को भूख ने मारा, तो कुछ चलते-चलते थक कर मौत की नींद सो गए.

migrant worker

इस लॉकडाउन के बीच सड़क पर अजीब मंज़र पसरा है. जिन सड़कों पर कभी मोटर गाड़ियां दौड़ा करती थीं, वहां भूख रेंगती नज़र आ रही है. कैसे घर पहुंचना है. किस रास्ते से जाना. कब पहुंचेगे. कुछ नहीं पता. ये बस चल रहे हैं. चलते जा रहे हैं. किसी ने कुछ खाने को दे दिया तो खा लिया. किसी ने पानी पिलाया तो पी लिया. जहां अंधेरा हुआ वहां सो गए. पर कमबख्त रास्ता इतना लंबा है कि मंज़िल मिल ही नहीं रही. बूढ़ी मां को साइकिल के पीछे बैठे एक महीने से ऊपर हो चुका है. दक्षिण भारत से राजस्थान अपने घर वो साइकिल पर ही निकल पड़ा है. घर कब पहुंचेगा, पता नहीं.

migrant worker

इन सब आशाओं के बीच वो परेशान हैं. लेकिन सब मौन हैं. और जो बोल रहे हैं. वो बोलने का नाटक कर रहे हैं. हमें अभी भी समझना होगा कि ये हिंदुस्तान की रीढ़ की हड्डी हैं. इन्हें ऐसे नहीं खोने देना है. इन्हें इंसानियत की थाली परोसना है. न कि मज़हब और यही इस थम से पड़े हिंदुस्तान की मांग है.

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