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देश और देशवासियों को बचाने के लिए लॉकडाउन लागू है. और ये लागू भी इसलिए है. क्योंकि इस वायरस से बचने का फिलहाल कोई और विकल्प है नहीं। लेकिन इस लॉकडाउन से प्रवासी मज़दूरों की जान निकाल दी है. कोई 200 सौ किलोमीटर पैदल चलकर घर की चौखट तक पहुंचने की कोशिश में जुटा है. तो कोई परिवार को एक साइकिल के सहारे हज़ार किलोमीटर तक की दूरी तय करने की तैयारी कर रहा है.

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लेकिन बात बस इतनी सी नहीं है. कोसों की दूरी, कंक्रीट सड़कें और तपती धूप उनकी उम्मीदों को हर पहर धराशायी कर रही हैं. खाने के बगैर पेट भी सिकुड़ चुका है. बच्चे भी अपनी माँ की तरफ आस भरी नज़रों से देख रहे हैं कि कुछ खाने को मिलेगा। लेकिन ये सब आज की परिस्थिति में काल्पनिक हो चला है. वो बच्चे भी आज चुप हैं. कोई खिलौना भी नहीं पसंद आ रहा है. चाहत है, तो बस रोटी की. जो शायद सही सलामत पहुंचने के बाद घर पर ही नसीब होने वाली है.

इन सबके बीच वो पैदल चल रहे हैं. पैंट की जेब में एक पैकेट बिस्कुट पड़ा है. उसी के सहारे मीलों का सफर काटना है. और काटनी हैं, वो रातें जो कभी सुकून से गुज़रती थीं.

इन्हीं सब में कोई पेट से (गर्भवती) है. चलना, बैठना मुश्किल है. आंखों में आंसू हैं. लेकिन फिर भी कदम थम नहीं रहे. क्योंकि भूख और महामारी से आने वाले बच्चे को दूर ले जाना है.

लॉकडाउन से लाखों लोग परेशान है। दिल्ली-मुंबई से यूपी-बिहार वाले लोग अपने घर वापस जाने को निकल पड़े हैं। बस ट्रेन नहीं मिलने की स्थिति में ये लोग पैदल ही निकल पड़े हैं। जिसे जो मिल रहा है उसी पर बैठ जा रहा है। हालत यह है कि कोई रिक्शा ले लिया है ताे कोई ठेला।

यही नहीं बीते दिन एक ही परिवार के 15 सदस्य फेज टू के रास्ते उन्नाव के लिए चल दिए। इनमें 11 सदस्य ठेले पर और बाकी चार लोग पैदल चल रहे थे। इनमें छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे।

ठेली पर बच्चे सवार थे. जबकि एक युवक उसे चला रहा था। ठेली पर सामान भी रखा था। ठेली में हैंडल पकड़े एक किशोर भी बैठा हुआ था। परिवार के सदस्य सुरेश ने बताया कि

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वे और उनके एक रिश्तेदार का परिवार यहां किराए के मकान में रहता है। कोरोना वायरस की वजह से फैक्ट्री बंद हो गई है और मालिक ने सभी कर्मचारियों को निकाल दिया है। पास में जो पैसे थे वे खर्च हो चुके हैं। परिवार का पालन पोषण नोएडा में रहते हुए नहीं कर सकते हैं। घर जाने के लिए बस का किराया नहीं दे सकते हैं। ऐसे में परिवार के साथ ठेली पर ही निकल पड़े हैं। एक-एक करके सभी बड़े लोग ठेली चलाएंगे।

सुरेश ने बताया कि सुबह से पूरे परिवार ने कुछ नहीं खाया है। रास्ते में कहीं कोई खाना बांट रहा होगा तो सभी खा लेंगे और जैसे तैसे घर पहुंच जाएंगे।

शहर में इस परिवार जैसे हजारों ऐसे लोग हैं, जो कि पैदल, ठेली और साइकिल से अपने घरों के लिए निकल पड़े हैं। कई लोगों का यह भी कहना है कि वे अब गांव में खेती करेंगे। छोटी सी परचून की दुकान खोल लेंगे लेकिन परदेस वापस नहीं आएंगे।

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पत्नी थक गई तो गोद में उठा लिया

बलिया के रहने वाले कपिल नोएडा के सिटी सेंटर के पास रहते है। बस के चलने की जानकारी मिली तो वो सुबह ही नोएडा से कौशांबी तक पैदल निकल पड़े। इनके साथ इनकी पत्नी और बच्चा था। पैदल चलने के कारण इनकी पत्नी चल नहीं पा रही थी तो उन्होने अपनी पत्नी को गोद में उठाकर कौशांबी बस डिपो तक ले कर आए। कपिल को जल्दी घर पहुंचने की उम्मीद है।

काम बंद हुआ तो पैदल ही निकले

कन्नौज के रहने वाले रामसेन दस साल से अपने परिवार के साथ दिल्ली के सीलमपुर में सिलाई का काम करते हैं। इनके परिवार में पत्नी समेत चार बच्चे हैं। लॉकडाउन होने के कारण इनका रोजगार बंद हो गया। वह अपने परिवार के साथ सीलमपुर में बस नहीं मिलने के कारण पैदल ही कौशांबी बस डिपो की ओर निकल पड़े। कौशांबी बस डिपो पर भी कन्नौज जाने के लिए बस नहीं मिलने पर पैदल ही घर की ओर जाने के लिए आगे बढ़ने लगे।

इस पर रामसेन ने बताया कि रास्ते में अगर बस मिल जाएगी तो ठीक नहीं तो पैदल ही घर जायेंगे।

नौकरी चली गई अब दिल्ली रहकर क्या करें…

अलीगढ के रहने वाले नीरज टिकरी बार्डर पर इलेक्ट्रानिक शोरुम में काम करते हैं। नीरज को कंपनी ने 19 मार्च को निकाल दिया था। परिवार के साथ नीरज टिकरी बॉर्डर के पास रहते हैं। लॉकडाउन और नौकरी से निकल जाने के कारण नीरज ने घर का रूख किया है.

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ऐसे एक-दो नहीं। बल्कि हज़ारों परिवार हैं. जो भूखे मरने की कगार पर हैं.

 

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