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राजनीति के इतिहास में ऐसे कई बड़े कारनामे हुए हैं. जब क्या नेता क्या समर्थक सबके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. आज की कहानी भी बड़े उलटफेर की पृष्टभूमि पर आधारित है. तो आइये शुरू करते हैं.

सोचो अगर गृह मंत्री अपने गृह क्षेत्र में हार जाए तो क्या होता है. सुर्खियां बनती हैं, करियर संवरता है. लेकिन जिस जायंट किलर का ये किस्सा है, वो तो कमोबेश रो रहा था. कसम दे रहा था. मैं ससुराल नहीं जाऊंगा, डोली रख दो कहारो की तर्ज पर. पहेली बुझाना बंद करते हैं और किस्सा शुरू.

बात है 1989 के लोकसभा चुनाव की. पत्रकार देश की वीआईपी सीटों का खाका खींच रहे थे. ऐसी ही एक सीट थी राजस्थान की जालौर सीट. नई वीआईपी सीट पुराने नेता के चलते. नेता थे राजीव गांधी सरकार में होम मिनिस्टर बूटा सिंह. वही बूटा सिंह जो बाद में नीतीश कुमार के लिए वरदान बनकर आए. अभिशाप की शक्ल में.

तो बूटा सिंह, पंजाब के बड़े दलित नेता, कांग्रेस की कई सरकारों का हिस्सा, पंजाब के ही रोपड़ से चुनाव लड़ते थे. 1967 से लगातार. लेकिन 1984 तक आते आते उनके सूबे की हवा बदल चुकी थी. ऑपेरशन ब्लू स्टार हो चुका था और 84 के सिख विरोधी दंगे भी. पंजाब में चुनाव के हालात नहीं थे. ऐसे में राजीव गांधी ने बूटा को पंजाब से राजस्थान शिफ्ट कर दिया. मारवाड़ के इलाके में. जालौर की सुरक्षित सीट पर. बूटा आसानी से चुनाव जीत गए. राजीव कैबिनेट में पहले दो साल कृषि मंत्री रहे और फिर गृह मंत्री. पांच साल पूरे. फिर चुनाव. फिर जालौर. बस एक ही फिर नहीं था. 84 सा माहौल.

कांग्रेस विरोध की हवा तेज थी. हर जगह अलग अलग विपक्षी पार्टियां मोर्चा ले रही थीं. कई जगह जनता दल और बीजेपी में अनौपचारिक जुगलबंदी थी. इन सबके बावजूद भाजपा में जालौर से लड़ने को कोई राजी नहीं था. भाजपा के कर्ता-धर्ता और पूर्व मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत के लिए अजब स्थिति थी. फिर उन्होंने कुछ साथियों से चर्चा की. और किसी को बुला भेजा.

अगले दिन शेखावत जयपुर स्थित पार्टी कार्यालय में कुछ पत्रकारों के साथ बैठे थे. अलग अलग सीटों पर बन रहे समीकरणों पर चर्चा हो रही थी. कुछ ही महीनों के बाद होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी. तभी बाबोसा (शेखावत को नया काडर इसी नाम से बुलाता था) ने बुलावा भेजा. कार्यकर्ताओं को. नाम लेकर. हांक लगाई. भीतर एक नेता आया. दो बार का विधायक. और बिना दुआ सलाम किए बोलने लगा.

बाबा, कसम है. जालौर नहीं जाऊंगा. मैं नहीं जाऊंगा.

शेखावत ने सुना, घूरा, फिर मुस्कुराए. बोले कुछ नहीं. कुर्सी कुछ पीछे जरूर की. पीछे की दीवार से टिकी थी एक अलमारी. उसे खोला और अखबार में लिपटा एक लिफाफा उस नेता को पकड़ा दिया. नेता कुछ देर खड़ा रहा. फिर लिफाफा ले चला गया.

क्या था उसमें. क्या होगा. सिंबल के लिए जरूरी कागजात थे. और निर्देश कि चुनाव की तैयारी करो, तुम्हें लड़ना है. लोकसभा चुनाव. बूटा सिंह के खिलाफ.

बाबोसा बोले. जयपुर से जालौर जाकर. उस नेता के लिए. कहा कि राजीव गांधी सरकार का ये नंबर दो मंत्री है. राजीव सरकार के सब दो नंबरी काम याद हैं न. भीड़ बोफोर्स वाले नारे लगाने लगी.

“गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है”.

फिर शेखावत बोले, इस मंत्री को हराइए, इस सरकार को भगाइए, अपने प्रदेश के प्रतिनिधि को जिताइए. पीछे कुछ रोज पहले का निरीह नेता खड़ा कुछ कुछ मुस्कुरा सा रहा था.

कुछ रोज बाद नतीजे आए. अब ये नेता पूरा मुस्कुरा रहा था. क्योंकि होम मिनिस्टर बूटा सिंह, जालौर से चुनाव हार गए थे. और जीते थे भारतीय जनता पार्टी के कैंडिडेट. कैलाश मेघवाल. जो बगल के उदयपुर जिले के नेता थे, मगर यहां जाइंट किलर बनकर उभरे थे. जैसे आज स्मृति ईरानी, सुब्रत पाठक, केपी यादव आदि का जिक्र होता है, वैसे ही 89 में कैलाश की धूम मची. मीडिया का सब ध्यान उन पर.

शेखावत ने भी ध्यान रखा. विधानसभा लड़ाया. बूटा को भगाने का मकसद फौरी तौर पर पूरा हो चुका था. कैलाश विधायक बने. फिर मंत्री बने. पिछली भाजपा सरकार में, यानी वसुंधरा के दूसरे दौर में विधानसभा अध्यक्ष रहे. और विधायक. अभी भी हैं.

हैं तो बूटा सिंह भी. लेकिन सियासी रूप से खत्म हो चुके हैं. उस चुनाव को हारने के बाद उनका करियर कुछ बरस थमा. अगले चुनाव में वह जीते. मगर नरसिम्हा राव ने पहले चार बरस तक उनको साइडलाइन ही रखा. बिलकुल आखिरी में लाल बत्ती थमाई. बूटा चुनाव हारते जीतते रहे. सोनिया का राज आया तो उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया. और यहीं वो नीतीश के लिए अभिशाप और वरदान बने. फरवरी 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए. नतीजे आते तो त्रिशंकु विधानसभा. न भाजपा-जेडीयू को स्पष्ट बहुमत, आरजेडी और एलजेपी भी पीछे।

कुछ महीने गतिरोध रहा. फिर पासवान की पार्टी में टूट होने लगी. 12 विधायक नीतीश के पाले में. और नीतीश का दावा. मगर बूटा ने दिल्ली के इशारे पर विधानसभा भंग कर दी. नीतीश मन मसोस कर रह गए. बिहार में फिर चुनाव हुए. और इस बार नीतीश का मन बल्लियों हो गया. क्योंकि इस दफा उनके नेतृत्व में एनडीए ने खुद से स्पष्ट बहुमत पा लिया था.

उधर सुप्रीम कोर्ट ने बूटा के फैसले की सख्त आलोचना की. फिर लौटती डाक से बूटा ने महामहिम कलाम को इस्तीफा भेज दिया. अगले बरस उन्हें नियुक्ति पत्र मिला. एससी कमीशन के चेयरमैन का. तीन बरस तक. फिर सब बरस बीते. बूटा का सियासी बूटा न खिल पाया. जाते जाते वो दौर याद आता है. जब पत्रकारों के सामने खिलखिलाते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी कहा करते थे.

“बूटा सिंह जी, अब अपनी कृपाण अंदर रखिए”.

ये सुन क्या विरोधी, क्या पार्टी वाले कुछ राहत की सांस लेते. क्योंकि वो बूटा का दौर था. राजीव को सरकारें गिरानी हों या मुख्यमंत्री बदलने हों. सब बूटा करते. सियासी पंडित कहते, एक और कटा, बूटा की कृपाण से.

तो इस कहानी से इत्ता तो समझ में आ गया होगा कि सियासत की बाजीगरी में कब कौन नायक बन जाए. कुछ भी कहना समझो खुद का काटने जैसा है.

कहानी को विराम. नमस्कार…

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