Contact Information

Theodore Lowe, Ap #867-859
Sit Rd, Azusa New York

We Are Available 24/ 7. Call Now.

अच्छा राजनीति भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है. और अगर यही राजनीति जब यूपी-बिहार की सरजमीं पर हो, बात ही क्या. क्योंकि यहां राजनीति का मतलब धनबल, जनबल और बाहुबल इन तीनों बातों का ख़ास ध्यान रखा जाता है. और यही वजह है कि नेता जी भौकाल टाइट करने में लगे रहते हैं.

खैर, अब बात बिहार की. और वहां के ‘रॉबिनहुड’ की.

वैसे तो ‘जंगल में रहने वाला एक किरदार जो अमीरों को लूटता है और ग़रीबों की मदद करता है’- मैकमिलन डिक्शनरी में रॉबिनहुड की तरह परिभाषित किया है. लेकिन बिहार में पहचान की राजनीति राजनीतिक पसंद पर हावी रही है. बिहार के पूर्व पुलिस प्रमुख गुप्तेश्वर पांडेय ने अपने आप को एक नए ‘रॉबिनहुड’ किरदार के रूप में पेश किया है.

गुप्तेश्वर पांडेय

लोग ये मानते रहे हैं कि इस तरह के रॉबिनहुड दौलत को ग़रीबों तक पहुंचाते रहे हैं. बिहार के खंडित परिदृश्य में ऐसे अपराधी-राजनेता रक्षक बन गए हैं. और दशकों से ऐसे कई नेताओं के लिए रॉबिनहुड का संबोधन इस्तेमाल किया जाता रहा है.

फ़िलहाल, बेउर जेल में बंद आपराधिक छवि वाले मोकामा के चर्चित नेता अनंत सिंह का भी एक म्यूज़िक वीडियो आया था, जिसमें वो पटना की सड़कों पर बग्घी में चलते दिखे थे. गीतकार उदित नारायण की आवाज़ में रिकॉर्ड किए गए गीत में उन्हें छोटे सरकार और मगहिया डॉन कहकर संबोधित किया गया था.

22 सितंबर को जब गुप्तेश्वर पांडे ने बिहार पुलिस के डीजीपी के पद से स्वेच्छा सेवानिवृत्ति ली, तो एक म्यूज़िक वीडियो लॉन्च किया गया, जिसमें उन्हें बिहार का रॉबिनहुड बताया गया. इस वीडियो में गुप्तेश्वर पांडे ‘रॉबिनहुड बिहार के’ गीत के गायक, लेखक और संगीतकार दीपक ठाकुर के साथ दिख रहे हैं.

ये गाना जल्द ही बिहार में वायरल हो गया. पांडे की पद छोड़ने की गुज़ारिश को सरकार ने उसी दिन स्वीकार कर लिया गया था और उनसे तीन महीने का नोटिस पीरियड पूरा करने के लिए भी नहीं कहा गया.

गुप्तेश्वर पांडे और दीपक ठाकुर ने इस वीडियो को अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर साझा किया था. लेकिन बाद में दीपक ठाकुर ने इंडियन पुलिस फाउंडेशन के ऐतराज़ जताने पर ये वीडियो हटा लिया.

इंडियन पुलिस फाउंडेशन ने अपने बयान में कहा, “एक राज्य के डीजीपी का इस तरह के वीडियो को साझा करना अच्छा नहीं है, इससे उनके कार्यालय और वर्दी का सम्मान कम होता है. इससे उनके कनिष्ठ कर्मचारियों के लिए भी ख़राब उदाहरण पेश होगा. ये आचरण को लेकर नियमों का उल्लंघन भी है.”

अब चुनाव लड़ने की तैयारी

पद छोड़ने के कुछ दिन बाद ही उन्होंने बिहार में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड का दामन थाम लिया. वीडियो में वर्दी पहने दिखने वाले पांडे ने बाद में कह दिया कि ये वीडियो उनके एक फ़ैन ने बनाया था और वो ना ही चुलबुल पांडे हैं और ना ही रॉबिनहुड.

गुप्तेश्वर पांडेय

वो कई बार ये कह चुके हैं कि वो किस तरह जनता की सेवा करना चाहते हैं. वो अब अपने गृह नगर बक्सर से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं.

उस सुबह, जब बिहार के पूर्व डीजीपी अब भी वर्दीधारी अधिकारी ही थे, एक कर्मचारी उनके पास आया, हाथ में बालों की डाई का सैशे और शीशे की कटोरी लिए हुए.

गुप्तेश्वर पांडे ने कटोरी को किनारे रखा और बातचीत जारी रखी. ये बिहार में चुनाव का समय है. दिखावा मायने रखता है. ख़ासकर तब जब आप ऐसे केस के बारे में मीडिया से ऑन एयर बात कर रहे हैं, जिसने टीवी की टीआरपी को तीन गुना बढ़ा दिया और जिसने राष्ट्रीय मीडिया को सुशांत सिंह राजपूत और रिया के रिश्तों की ओर मोड़ दिया.

जब उनसे पूछा गया कि क्या वो राजनीति में आने जा रहे हैं, उन्होंने कहा था कि अभी उनकी सेवा में एक साल और बाक़ी है. उन्हें साल 2021 में रिटायर होना था.

उन्होंने कहा कि मीडिया उन पर चरित्रहरण करने का आरोप लगा रहा है. हालांकि, उन्होंने ये नहीं कहा कि किसके चरित्र का हनन. इससे एक ही दिन पहले वो सारा दिन टीवी पर सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ़ दिलाने की बात कर रहे थे.

9 सितंबर को बहुत से लोग उनसे मुलाक़ात करने का इंतज़ार कर रहे थे. अब उन्हें और अधिक एयरटाइम मिलने वाला था. इन सबके बीच उन्हें अपने बालों को भी रंगना था.

उन्होंने कहा था- “अब रिया की कहानी ख़त्म”. वो ये कहते हुए उठ खड़े हुए कि उन्हें और भी काम करने हैं. बिहार के रहने वाले अभिनेता सुशांत सिंह राजपुत की संदिग्ध मौत के मामले में कई दिनों टीवी पर चली कयासबाज़ी के बाद रिया चक्रवर्ती को गिरफ़्तार कर लिया गया.

पूर्व डीजीपी ने कहा कि अभिनेत्री रिया ड्रग्स मामले में पूरी तरह बेनकाब हो गई हैं. गिरफ़्तारी की शाम ही वो टीवी पर बैठकर टिप्पणियाँ कर रहे थे.

सोशल मीडिया और मीडिया में सुशांत को न्याय दिलाने के लिए अभियान चलाया जा रहा था. पांडे एक ऐसे हीरो के तौर पर उभरे, जिन्होंने अकेले दिवगंत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ़ दिलाया. इसी वजह से ठाकुर ने पांडे को तुरंत रॉबिनहुड से जोड़ दिया था.

वॉट्सऐप पर अब पांडेय की प्रोफ़ाइल तस्वीर बदल गई है. खाकी की जगह अब वो खादी में हैं. लेकिन ये रंग चढ़ाने की तैयारी तो उन्होंने बहुत पहले से ही कर ली थी.

पांडेय के सोशल मीडिया पन्नों को पेशेवर लोग संचालित करते हैं. यहाँ पांडे अपनी उपलब्धियों के बारे में बात कर रहे थे. सात महीने पहले उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल शुरू कर दिया था. अपनी छवि सुधारने के लिए उन्होंने गोपालगंज में हुए एक तिहरे हत्याकांड पर विपक्ष के उठाए जा रहे सवालों के जवाब भी दिए.

और फिर आया सुशांत सिंह राजपूत का मामला, जिसने उन्हें टीवी का जाना पहचाना चेहरा बना दिया. 59 साल के गुप्तेश्वर पांडे साल 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और फ़ेसबुक पर उनके सात लाख फ़ॉलोअर हैं.

पांडे ने साल 2009 में भी लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस लिया था लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला था. नौ महीने बाद वो फिर से पुलिस सेवा में आ गए थे. उस समय भी उनके इस फ़ैसले में सरकार ने उनका साथ दिया था.

बिहार के रॉबिनहुड

कई खंडों में बँटे राजनीतिक परिदृश्य वाले बिहार में आपराधिक छवि वाले बाहुबली नेताओं के लिए रॉबिनहुड का इस्तेमाल किया जाता रहा है. उदाहरण के तौर पर अनंत सिंह. अपराधी पृष्ठभूमि के लोगों के राजनीतिक सत्ता हासिल करने का सिलसिला तीन दशक पहले शुरू हुआ था.

बिहार में बाहुबलियों की कहानी झारखंड की कोयला खदानों से शुरू हुई थी. लेकिन झारखंड अब अलग राज्य है.

एक समय था जब मोकामा के बाहुबली अनंत सिंह की बिहार में रॉबिनहुड जैसी छवि थी. साल 2012 में जब नीतीश कुमार बिहार के लिए विशेष दर्जा मांग रहे थे, तब तैयार किए गए पोस्टरों पर एक तस्वीर अनंत सिंह की भी थी. अनंत सिंह ने बाढ़ में साल 2005 और 2010 में नीतीश कुमार के लिए चुनाव अभियान चलाया था.

सिर पर चौड़े किनारे वाली हैट लगाने वाले, आंखों पर काला चश्मा पहनने और अपने सरकारी आवास में अजगर रखने वाले सिंह कभी कभी घोड़ा-बग्घी पर बैठकर विधानसभा जाते थे. वो उस अपराधी-राजनेता गठजोड़ का हिस्सा माने जाते थे, जिसके लिए बिहार बदनाम रहा था.

साल 2015 में उन्होंने बिना कोई कारण बताए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया. साल 2005 में इंस्पेक्टर जनरल रहे अभयानंद से नीतीश कुमार ने जंगल राज का सफ़ाया करने के लिए कहा था.

बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद के लिए बिहार में क़ानून का शासन बहुत समय के लिए नहीं था, सिवाए उसके जब उन्हें जंगलराज के सफ़ाए का आदेश दिया गया. उस दौर में स्वघोषित रॉबिनहुड नेताओं को जेल भेजा गया था.

वो कहते हैं, “प्रजातांत्रिक क़ानून के शासन में अगर कोई रॉबिनहुड हो सकता है, तो वो क़ानून ही है. अगर कोई और भी रॉबिनहुड है तो आप एक लोकतांत्रिक राज्य नहीं है. लेकिन अब फिर रॉबिनहुड लौट आया है. बाहुबली चुनाव में खड़े होते हैं क्योंकि राजनेता नाकाम हो जाते हैं. अब पुलिस रॉबिनहुड की तरह बन रही है.”

नीतीश की पार्टी में आपराधिक छवि के नेता

अभयानंद ने 1959 के आर्म्स एक्ट का खूब इस्तेमाल किया था. इसमें पुलिसकर्मी ही मुख्य गवाह होते हैं और फिर अभियुक्त पर फ़ास्ट ट्रैक अदालत के ज़रिए फै़सले दिलाना आसान हो जाता है.

इसी तरह सिवान के शहाबुद्दीन को भी जेल भिजवाया गया था. आरजेडी के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन सिवान में अपना सामांतर शासन चलाते थे. साल 2012 में जब मेरी मुलाक़ात अभयानंद से हुई थी, तब उन्होंने बताया था कि नीतीश सरकार के पहले कार्यकाल में वो 75 हज़ार अपराधियों को जेल भेजने में कामयाब रहे थे.

भारत में अपराध, चुनाव और प्रजातंत्र के संबंधों पर किताब लिखने वाले मिलन वैष्णव ने कहा था कि जब उन्होंने मोकामा में लोगों से ये पूछा कि वो अनंत सिंह को क्यों चुनते हैं तो उन्हें पता चला कि वो उसके आपराधिक कामों से परिचित थे और उन्हें लगता था कि वो उनके हितों की रक्षा कर सकते हैं.

गुप्तेश्वर पांडेय

अनंत सिंह का अपराध ही उनकी विश्वसनीयता बन गई. वो उच्च जाति के थे और उनके समर्थकों को लगता था कि वो क्षेत्र में यादव जाति के वर्चस्व को सीमित कर सकते हैं. बिहार में आज भी जातिवाद का बोलबाला है.

कई तरह से बिहार के पहले रॉबिनहुड मोहम्मद शहाबुद्दीन 1967 में सिवान के प्रतापपुर में पैदा हुए थे. उनके मामले में भी राजनीति ने अहम भूमिका निभाई. साल 2000 आते-आते सिवान के इस बाहुबली पर 30 से ज़्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे.

उन्होंने साल 1990 में आरजेडी के यूथ विंग का दामन थामा था और अगले सालों में वो सिवान में अपना अलग शासन चला रहे थे. कई आपराधिक मामलों में शामिल रहे साधू यादव जैसे लोगों के सिर पर लालू यादव के हाथ ने अपराध और राजनीति के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया था.

नीतीश कुमार को भी अनंत सिंह का समर्थन प्राप्त था, जिनके बारे में कहा जाता है कि वो अपने विरोधियों को तालाब में पल रही छोटी शार्क मछलियों को खिला देते थे. इस तरह की बातों की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं की जा सकती है. लेकिन लोगों में ये चर्चित कहानियाँ हैं.

साल 2013 में जदयू ने तीन हिस्ट्रीशीटर और बाहुबलियों को पार्टी में शामिल किया था- बबलू देव, चुन्नू ठाकुर और शाह आलम सब्बू. झारखंड के देवघर में रहने वाले लेखक प्रसन्ना चौधरी कहते हैं कि रॉबिनहुड सिर्फ़ बिहार तक ही सीमित नहीं है. वीरप्पन को भी रॉबिनहुड कहा जाता था.

बिहार में अधिकतर बाहुबली नेता जातिगत उत्पीड़न और क़ानून के शासन के नाकाम होने की स्थिति में लोगों के रखवाले के तौर पर ख़ुद को पेश करके पैदा होते रहे हैं. इसके पीछे पहचान की राजनीति भी रही है.

कहते हैं जब गुप्तेश्वर पांडे को रॉबिनहुड के रूप में स्वीकार किया जाता है तब वो क़ानून को नज़रअंदाज़ कर त्वरित न्याय की अवधारणा को मज़बूत करते हैं. देश में यही हो रहा है. इससे लोगों को लोकप्रियता मिलती है, उनके इर्द-गिर्द प्रशंसा का घेरा बन जाता है. इसमें कुछ अहंकार भी है और कुछ मनोवैज्ञानिक अवधारणाएँ भी.

दूसरी और पप्पू यादव जैसे नेता हैं, जो साल 2013 में 15 साल पुराने क़त्ल के मुक़दमे में बरी होकर जेल से निकले थे और अब जन अधिकार पार्टी के नेता हैं. उनकी पार्टी ने इस विधानसभा चुनाव में तीन अन्य दलों के साथ गठबंधन किया है, जिनमें भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी भी शामिल है.

लालू प्रसाद यादव की पार्टी के 15 सालों के कार्यकाल के दौरान बिहार में पप्पू यादव और उन जैसे कई नेता अपनी ताक़त के दम पर राज्य की राजनीति पर हावी होते गए और उन्हें लोगों से एक ऐसा नेता के तौर पर स्वीकार्यता मिलती गई, जो उनका ध्यान रख सकता था और ज़रूरत पड़ने पर न्याय दे सकता था.

रॉबिनहुड

ये विडंबना ही है कि साल 2005 में आरजेडी ने सत्ता गँवा दी थी और नीतीश कुमार की सरकार ने अपराधी छवि वाले नेताओं को सलाखों के पीछे भेजने का बीड़ा उठाया था, अब उन्हीं नीतीश की पार्टी से पूर्व पुलिस प्रमुख रॉबिनहुड बनकर चुनाव लड़ रहे हैं.

अब ज्यादा कहना ही क्या बस ये समझो. राजनीति में सब जायज़ ही समझा जाए.

Share:

administrator