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गांधी परिवार मेंं संजय गांधी एक ऐसे शख्स थे, जो हमेशा विवादों मेंं रहे. चाहे मेनका गांधी से उनकी शादी का मामला हो या फिर उनकी अपनी मां इंदिरा गांधी से संबंधों की बात हो. कई विवाद उनके साथ जुडे थे, फिर भी लोग उनकी एक झलक देखना चाहते थे, उन्हें सुनना और समझना चाहते थे. यही वजह थी कि उनके सभा मेंं भारी भीड़ होती थी.

sanjay gandhi

संजय गांधी इंदिरा गांधी के छोटे बेटे थे. उनका जन्म 14 दिसंबर 1946 को हुआ था. 23 जून 1980 मेंं मात्र 33 साल की उम्र मेंं उनकी मृत्यु हो गई. मौत का कारण उनका शौक बना.

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तेज विमान उड़ाने का शौक

संजय गांधी को तेज़ हवा में विमान उड़ाने का बहुत शौक था. उनके पास विमान उड़ाने का लाइसेंस भी था. संजय के इस शौक को देखते हुए 1977 से ही इंदिरा परिवार के नज़दीकी धीरेंद्र ब्रह्मचारी एक टू सीटर विमान ‘पिट्स एस 2ए’ आयात कराना चाहते थे.

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अखिर 1980 में जाकर भारत के कस्टम विभाग ने उसे भारत लाने की मंज़ूरी दी. जल्दी में असेंबल कर सफ़दरजंग हवाई अड्डे स्थित दिल्ली फ़्लाइंग क्लब इसे फ़्लाइंग क्लब के इंस्ट्रक्टर ने उड़ाया. सबकुछ ठीक होने के बाद संजय ने पहली बार 21 जून 1980 को नए पिट्स को हवा मेंं उड़ाया.

दूसरे दिन 22 जून को संजय गांधी ने पत्नी मेनका गांधी, इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर उन्होंने उड़ान भरी और 40 मिनट तक दिल्ली के आसमान पर विमान उड़ाते रहे.

23 जून को फिर उन्होंने इसे माधवराव सिंधिया के साथ उड़ाने की प्लानिंग की, लेकिन बाद मेंं संजय गांधी ने सिंधिया के बजाए दिल्ली फ़्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के साथ उड़ान भरने की सोची। वह उनके घर गए और सक्सेना को जल्दी आने को कहा. वह जरा भी इंतजार करने को तैयार नहीं थे, कैप्टन सक्सेना पिट्स के अगले हिस्से में बैठे और संजय ने पिछले हिस्से में बैठे।

सात बजकर 58 मिनट पर उन्होंने टेक ऑफ़ किया। संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगाए. चौथी लूप लगाने ही वाले थे कि कैप्टन सक्सेना के सहायक ने नीचे से देखा कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया है. पिट्स तेज़ी से मुड़ा और नाक के बल ज़मीन से जा टकराया।

सक्सेना का सहायक तेजी से साइकिल भगा कर घटनास्थल पर आया. उसने देखा कि पिट्स टू सीटर मलबे में बदल चुका था. संजय गाँधी का शव विमान के मलबे से चार फ़ीट की दूरी पर पड़ा था. कैप्टेन सक्सेना के शरीर का निचला हिस्सा विमान के मलबे में दबा हुआ था. लेकिन सिर बाहर निकला हुआ था.

उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अकबर रोड पर बैठे इंदिरा गांधी से मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. एक्सिडेंट की खबर सुनकर इंदिरा गांधी बदहवास होकर घटनास्थल पर पहुंची. इंदिरा के पहुंचने से पहले ही फ़ायर ब्रिगेड ने विमान के मलबे से दोनों शव निकाल लिए थे और उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस में रखा जा रहा था.

अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर सबसे पहले अस्पताल पहुंचे

रानी सिंह अपनी किताब में लिखती हैं कि इंदिरा ने राम मनोहर लोहिया अस्पताल की तरफ रुख किया, तब तक डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया था. घटना की खबर सुनकर सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर अस्पताल पहुंचे थे. उस मौके पर इंदिरा गांधी ने अपनी आंखों पर काला चश्मा लगा रखा था.

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पूपुल जयकर अपनी किताब ‘इंदिरा गांधी’ मेंं लिखते हैं कि वाजपेयी ने आगे बढ़कर कहा कि इंदिरा जी इस कठिन मौके पर आपको बहुत साहस से काम लेना होगा. इस पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. इसके बाद इंदिरा चंद्रशेखर की तरफ मुड़ीं और उन्हें एक तरफ ले जाकर बोलीं कि मैं कई दिनों से आपसे असम के बारे में बात करना चाह रही थी, वहां हालात बहुत गंभीर हैं. चंद्रशेखर ने कहा कि इसके बारे में बाद में बात करेंगे तब इंदिरा ने जवाब दिया कि नहीं-नहीं, ये मामला बहुत महत्वपूर्ण है.

अस्पताल में उनके पीछे-पीछे पहुंचे विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी देखकर उन्होंने कहा कि आप तुरंत लखनऊ लौट जाइए, वहां पर इससे बड़े मसले हल करने के लिए पड़े हैं. जब तक डॉक्टर संजय के क्षत-विक्षत शव को सही कर रहे थे. तब तक इंदिरा भी उनके साथ ही खड़ी रहीं.

लेकिन इन सबके बावजूद भी संजय की मौत से इंदिरा गांधी पर कई सवाल उठे थे. जिन्हें बाद में अफवाह बताया गया.

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