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कोरोना संक्रमण देश में लगातार पैर पसारता जा रहा है. आलम ये है कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देशनुसार 21 दिनों के लॉकडाउन को बढ़ाने पर विचार चल रहा है. इस महामारी से लड़ने के लिए जहां एक ओर घरों में बैठने की सलाह दी जा रही है. वहीं दूसरी ओर घरों से दूर दिहाड़ी मज़दूर रोटी के लिए तरस रहे हैं.

LOKDOWN

रिपोर्ट के मुताबिक, लॉकडाउन के बाद से लगभग 90 फीसदी मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं. क्योंकि न तो उनके पास खाने के पैसे हैं. और ही रहने के लिए छत. ऐसी स्थिति में सरकार ने जो भी कदम उठाए हैं. उनमें इन मज़दूरों को न के बराबर लाभ मिलता दिख रहा है. जिसके पीछे कई बड़ी वजहे हैं.

पहली बड़ी वजह. लगभग 94 फीसदी मज़दूरों के पास पहचान पत्र भी नहीं हैं. जिनसे इन्हें सरकार का सहयोग मिल सके. ऐसी स्थिति में उनकी हालत बद से बदतर होती जा रही है.

मौजूदा समय में देखा जाए तो करीब-करीब 17 फीसद ऐसे मज़दूर हैं. जिनके बैंक खाते भी नहीं हैं. जिसकी वजह से उन्हें सरकार से मिल रही सुविधाओं से भी वंचित रहना पड़ रहा है.

अब ऐसे में न तो वो घर पहुँच पा रहे हैं. और न ही उन्हें 2 टाइम का खाना मिल पा रहा है. इस घातक परिस्थिति में सरकार को इन सभी देश के आम नागरिकों का ख्याल रखकर नए कदम उठाने चाहिए। जिससे उन्हें राशन मिल सके.

कंस्ट्रक्शन सेक्टर धराशायी

देश में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में साढ़े 5 करोड़ के आस-पास काम करने वाले हैं. लेकिन इनमें से लगभग 37 फीसदी लोगों ये तक नहीं पता कि आखिर केंद्र सरकार उनकी मदद के लिए कौन सी योजना चला रही है. यही नहीं इसमें से लगभग 5 करोड़ कामगार लोग सरकारी लाभ से कोसों दूर हैं. और न ही इन लोगों के पास पूरे डाक्यूमेंट्स हैं.

इसके पीछे की वजह गांव-घर से कोसों से दूर दूसरे राज्य में कमाने के लिए पलायन करना है. जहां रोज की कमाई से रोज के खाने का बंदोबस्त होता है. लेकिन अब जब लॉकडाउन के चलते सारे काम ठप पड़े हैं. तब स्थिति और भी भयावह हो जाती है. ऐसे में अब केंद्र के आलावा राज्य की सरकारों को भी इसपर अमल करना चाहिए। जिससे इन लोगों को राहत मिल सके है.

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